कविताएँ.....


पथिक की तीन कविताएँ ; 📚✍️

१ - " संबंधों की डोर "
फस जाता हूँ मैं अक्सर.....।
संबंधों के बीच मे
उसी तरह !
जैसे किसी पक्षी के चोंच से एक दाना
गिर पड़ा हो गहरे दरार में,
अनेक यत्नों के बीच
निकाल पाना हो जाता है मुश्किल !
फस जाता हूँ मैं अक्सर.....।
कभी-कभी उन संबंधों पर
पड़ जाती हैं चोटें गहरी,
लुहार के लोहे की भांति !
तिलमिला उठता है अंतर्मन,
उन स्वार्थमय संबंधों की
जलील हरकतों से
फस जाता हूँ मैं अक्सर.....।
मनुष्य का गिरना उसके स्वार्थ के पराकाष्ठा
की होती है हद!
किन्तु ; नियति की चोट जब पड़ती है
आदमी के 'नीयत' पर !
वक्त के मार सी,
तो उस अभागे मन को होता है पश्चाताप
अपने अकर्मण्य कर्मों पर
फस जाता हूँ मैं अक्सर उन स्वार्थमय
संबंधों के बीच में.....!
         
       मनकामना शुक्ल "पथिक"
       सर्वाधिकार सुरक्षित:📚✍️

२- 'उम्मीद'
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सृष्टि के आरंभ से ही जुड़ा है
सम्बन्ध, मानव का उम्मीदों से!
जैसे मनु का था सतरूपा से
एक नएपन की उद्दाम,अतृप्त
आकांक्षाओं की अमूर्त्त भविष्यमत्ता से
वहीं-वहीं !
जैसे आत्मा का शरीर से!

उम्मीदें रहेंगी तभी तो, रहेगा जीवन
पृथ्वी, आकाश व प्रकाशित ग्रहों की तरह,
रहेगा अड़िग सत्य भी
शिराओं में स्पंदित लहू के सदृश
प्रलय प्रवाह में भी जीवंतमय बने रहने का संदेश!

आत्मा रहेगी ही कहाँ ?
जब शरीर ही नही रहेगा !
उम्मीदें हमें हौशले देती हैं
खोल देती हैं, तमाम नाकामयाबियों के मध्य कामयाबी का एक रहस्यमय द्वार
क्षितिज के उस पार भी
और ले जाती हैं हमें अपने मुकाम तक
मोक्ष के अंतिम सोपानों पर!

        मनकामना शुक्ल 'पथिक'

३- 'रहस्य'
   ''''''''''''''

हर वस्तु,स्थान का भी होता है
अपना एक अद्भुत रहस्य
जिसमे छिपी होती हैं
अपार संभावनाएं

उन रहस्यों में जाना
दूसरी दुनिया में जाने के समान है
जैसे मृत्य के बाद
उस लोक में चले जाने का एहसास !

यह एहसास ही मानव का कराता है प्रत्यक्षीकरण
उन अदृश्य,कलात्मक,निगूढ़, अकाल्पनिक दुनिया से !

इन रहस्यों के बीच भी खो जाता है
मानव का जीवन!

जीवन को खोजने की तलाश में
रोटी और धंधों के बीच भी
होती है एक अदृश्य कड़ी!

जिसे हम पाने की लालसा में
बढ़ते रहते हैं, खोजते रहते हैं
किसी खोई वस्तु को पाने की
अतृप्त आकांक्षा में!

फिर भी घिरे रहते हैं
परत दर परत वे रहस्य
जो कभी खत्म ही नही होते,
मानव के बाद भी !

अनवरत जारी रहता है, उनका दस्तूर
यूँ ही जीवन-जगत की जटिलताओं
के मध्य भी!

दूसरी दुनिया में दख़ल डालने
और पुनः उसी में खो जाने की आत्मानुभूति
का एक सार्थक प्रयास दर्शन की भाँति !

      मनकामना शुक्ल 'पथिक'
      सर्वाधिकार सुरक्षित         mkshukla2586@gma.com