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आप सभी को शिक्षक दिवस की मंगलकामनाएँ..!साथियों ! दरअसल मुझे श्रीप्रकाश शुक्ल जी का शिष्य बनने का मौका कभी भी नही मिला, फिर भी मैं उन्हें एकलव्य की भाँति आरम्भ से ही अपना गुरु मानता हूँ..!श्रीप्रकाश शुक्ल जी जितने अच्छे कवि व आलोचक हैं, उतने ही अच्छे पथप्रदर्शक भी हैं..!उनका होना ही मेरे होने का प्रमाण है। मैं अपने प्रेरणास्रोत व प्रिय कवि की हाल ही प्रकाशित पुस्तक 'क्षीरसागर में नींद' की एक समीक्षा उन्हीं को समर्पित करते हुए प्रस्तुत कर रहा हूँ। हालाँकि इस पुस्तक की समीक्षा बहुत पहले ही लिख चुका था पर कोरोनाकाल की परिस्थितियों के कारण कहीं प्रकाशित कराने का मौका नही मिल पाया था। पर अब यह समीक्षा पांजाब से प्रकाश साहित्यिक पत्रिका रचनावली में छप कर अगले महीने आप तक आ जायेगी।**********************"लोक के बहाने सत्ता पर चोट करती कविता" मनकामना शुक्ल पथिक✍️ हिंदी का समकालीन कविता संसार काफी समृद्ध व बहुवर्णी है। इसमे कुछ वरिष्ठ तो कुछ नयी पीढ़ी के कवि बेहद सक्रिय हैं। इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण नाम कवि श्रीप्रकाश शुक्ल का है,,,,,, शुक्ल जी नब्बे की दशक की कविता पीढ़ी के बेहद महत्वपूर्ण कवि हस्ताक्षर हैं। आपकी कविताएँ हमे विपरीत परिस्थितियों से टकराते के बाद भी खंडित न होनेे का साहस प्रदान करते हुुुए अपने समय व समाज का व्यापक बोध कराती हैं। जिसमे नवीनता है, जिजीविषा है और आत्मसंघर्ष भी है।******************हालांकि समकालीन साहित्य के इस समकालीनता के विशिष्ट अर्थों पर थोड़ी चर्चा करना भी जरूरी है,,,,,,समकालीनता सिर्फ रचना की अन्तर्वस्तु से जुड़ा सवाल नही है, बल्कि यह रचनाकार के भाषा व शिल्प से भी जुड़ा होता है। कोई भी रचनाकार जितना ही स्वतंत्र व समर्पित होकर समयानुकूल अपनी रचना का सृजन करता है, उसकी रचना उतनी ही प्राणशील व कालजयी होती है।एक वक्तव्य में समकालीनता पर विचार व्यक्त करते हुए वरिष्ठ कवि राजेश जोशी जी ने कहा है कि,,,,,, अपने समय के साथ मुठभेड़ करते हुए, उसमे हस्तक्षेप करते हुए, हर रचनाकार को अपनी समकालीनता स्वयं अर्जित करनी होती है।अगर हम राजेश जोशी जी के इस महत्वपूर्ण वैचारिकता पर चिंतन करते हैं तो श्रीप्रकाश शुक्ल जी अपने समय से मुठभेड़ करते हुए एक महत्वपूर्ण कवि नज़र आते हैं, जिनमे विपरीत परिस्थितियों से टकराने का साहस है, और वे रिश्क लेने से गुरेज नही करते बल्कि मज़बूती के साथ गलत का पुरज़ोर विरोध भी करते नज़र आते हैं,,, इसका प्रमाण आप पक्का महाल की कविताओं में साफ़ तौर पर देख सकते हैं।ये पक्क़ा महाल की सभी कविताएँ एक सचेत कवि की कविताएं हैं,,, जिसमे कवि का अपने परिवेशीय वातावरण व समय समाज का बोध पूरी गहराई के साथ रचा बसा हुवा है। और कवि के इस संग्रह 'क्षीरसागर में नींद' की लगभग सभी कविताओं में समकालीन स्थितियों के सूक्ष्म से सूक्ष्मतम संकेत साफ-साफ मिलेंगे किंतु कुछ कविताएँ लोकपक्ष को लेकर लिखी गयी हैं। जिसमे कुछ मे तो राजनीतिक पाखण्ड और शासन व्यवस्था एवं आज की त्रासद विसंगतियों का मार्मिक चित्रण साफ़ तौर पर मिलता है, किंतु उसमे किसी भी प्रकार का राजनीतिक मत मतांतरण नही दिखाई देता, न ही कवि किसी दल विशेष के साथ प्रतिबद्ध दिखाई देता है।फिर भी शुक्ल जी की कविताओं में सामाजिक-राजनीतिक चेतना का एक व्यापक बड़ा हिस्सा विद्यमान है। जिसमे कवि का सत्ता के प्रति व्यापक आक्रोश भी दिखाई देता है।और कवि भूमण्डलीकरण, नव उदारवाद और निजीकरण के इस विकट दौर में पक्क़ा महाल जैसी कविताओं के माध्यम से एक सार्थक हस्तक्षेप करते हुए पूंजीवाद के खिलाफ खड़ा नज़र आता हैं। यह वहीं एक महत्वपूर्ण बात है जो कवि को समकालीन भी बनाती है, और समकालीनता के उच्च पायदान पर ला कर खड़े भी कर देती है।******************'क्षीरसागर में नींद' यह कवि का छठा प्रकाशन है। जो कि अति विशिष्ठ तथ्यों को समेटा हुवा बहुआयामी काव्य संग्रह है। वैसे सामान्य तौर पर देखा जाए तो शुक्ल जी एक सफल आलोचक भी हैं। किंतु पहले आप एक कुशल कवि हैं। आप जितने ही लोकधर्मी हैं उतने ही क्रांतिधर्मी कवि हैं। आप अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नही करते, बल्कि उन्ही सिद्धांतो में नए विकल्प तलाश लेते में माहिर दिखते हैं। जिसमे भक्ति और मुक्ति दोनो का मार्ग दूर-दूर तक साफ-साफ दिखाई देता है।'क्षीरसागर में नींद' कवि का ऐसा काव्य संग्रह है जिसमे कवि के जीवनानुभवों को साफ तौर पर देखा जा सकता है, चाहे वह कवि के काव्यात्मक विकास-क्रम से हो या राजनीतिक, सामाजिक व मानव जन आकांक्षाओं के विरुद्ध हो रहे निरन्तर परिवर्तन के सन्दर्भों में हो,,,,,, लेकिन कवि का यहीं अनुभव उसे नए रचना संसार का ताना-बाना बुनने को बाध्य कर देता है। जो काशी की साँस्कृतिक धरोहरों व वहां की आम जनता से सहानुभूति व सरकारी तंत्र के प्रति व्यापक आक्रोश कवि के 'पक्का महाल' जैसी कविताओं में साफ तौर पर देखी जा सकती हैं।कोई भी कवि सच्चा कवि तब तक नही हो सकता जब तक कि वह लोक सेे न जुड़ा हो, और लोक की एक खास पहचान यह है कि उसमें कोई निजि दुनिया नही होती। और यहाँ भी कवि का कुछ भी निजि नही है। और जो है भी तो सार्वजनिक हो जाता है, यह स्वाभाविक भी है। कवि यहाँ जन आकांक्षाओं पर खरा भी उतरता है। उसके दुःख, पीड़ा, व संवेदनाओं का सहचर बनकर, आम जन के पीड़ा को हल्का करने का निरंतर प्रयास करता रहता है। यह प्रयास ही कवि को सच्चा सर्जक बना देता है। जिसकी सर्जना सामाजिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक धरोहर होती है।यहीं लोक से जुड़ाव ही कवि की आंतरिक भावनाओं के ताप पर तप कर ही उसकी कविताएँ समूचे साहित्यिक परिदृश्य में ढल जाती हैं। वैसे भी कविता सांकेतिक और अनुभव की भाषा मौजुुदगी के बिना संभव नही है।*****************'क्षीरसागर में नींद' की आपकी ये कविताएँ आँखों देखी घटनाओं का प्रत्यक्षीकरण कराती हैं, और कबीर के 'तूँ कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखन की देखी' को चरित्रार्थ भी करती हैं, हाँ यह जरूर है कि आप कबीर की भाँति समाज के लोगों को ललकारते नही, बल्कि रैदास की तरह उन्हें उसपर सोचने व समझने के लिए मजबूर कर देने वाले कवि हैं,,,,,,,,,,, पर आपकी रचनाओं में कबीर व रैदास जी की स्थिति न के बराबर देखकर मन थोड़ा व्यथित होता है। यहाँ तक कि आपने बुद्ध को भी नही छुवा,,,,,जबकि आप कबीर के जन्म व बुद्ध के प्रथम उपदेश स्थल से जुड़े हैं और आपके कुछ ही दूरी पर रैदास जी का पावन मंदिर भी है। किंतु आपकी रचना में तीनो महापुरुष नदारद दिखते हैं। खैर जो भी हो पर मेरा मक़सद कवि की रचना में कमियाँ तलाशना नही है, बल्कि कवि की साहित्य रूपी सागर से मोतियों को चुनना है। अतः यहां पर मैं इसे आपके चयन करने या न करने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर छोड़ देता हूँ, और मैं इसमे दख़ल नही डालना चाहता क्योंकि यह आपकी व्यक्तिगत भावनात्मकता का निजी प्रश्न है। किंतु उम्मीद है कि आगे की काव्ययात्रा में आपकी दृष्टि कबीर, रैदास व गौतमबुद्ध जी पर जरूर पड़ेगी।आप पक्का महाल की कविताओं में जो कि विकास के नाम पर बनारस जैसे शहर में हो रहे राजनीतिक छल-छद्म से व्यथित ही नही होते बल्कि वहां पर संस्कृति व प्राचीन धरोहरों के साथ हो रहे छेड़-छाड़ के विरुद्ध अपना तेवर अख़्तियार करते हुए आम जन के पक्ष में उनके अपने अस्तित्व के लिए खड़े भी रहते हैं। क्योंकि कवि को मालुम है कि यह राजनीतिक सत्ता हमारे आध्यात्मिक व सांस्कृतिक चेतना पर अपना प्रहार करने से बाज नही आएगी। जिससे हमारी सभ्यता व संस्कृति चोटिल होगी, कवि नही चाहता कि कदाचित ऐसा हो। शायद यहीं कारण है कि छेनी-हथौड़ों की निर्वासित चोट को व उससे निकली अनुगूँज को कवि सुनता है व कवि का हृदय द्रवित हो जाता है,,, और कवि उस राजनीतिक सत्ता से टकराने का साहस रखते हुए अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज की सोई हुई चेतना को जाग्रत ही नही करता बल्कि उसके परिणाम स्वरूप उपजी भयावह परिस्थितियों से अवगत भी कराता है,,,,मैं किसी मजबूर मजदूर के हथौड़े से नही टूटना चाहता/ हथौड़े व अन्न के बीच एक तनाव होता है/ जो शिव व शव के बीच के तनाव से/ ज़्यादे भयानक और भारी होता है!यहीं नही श्रीप्रकाश शुक्ल सभ्यता व स्वछता के नाम की दुहाई देने वाले राजनीतिबाजों पर व्यंग कसते हैंं..... राजनीति लहक रही/ भाषा बहक रही/ रेत दहक रही/ पानी है कि महक रहा/ और जलशयनी शिव परेशान हैं/ सभ्यता के स्वच्छता अभियान से!चारों तरफ सन्नाटा है/ चिता खोज रही है लकड़ियाँ/ लालू यादव की चिंता है/ कि चाय पर सिमटी राजनीति में/ कब तक बचा पाएगा अपनी यह गुमटी/ मणिकर्णिका पर!एक आँधी है जो उठ रही है चारों ओर/ और पक्का महाल में उड़ रही है धूल/ पक्का महाल से आजकल घंटों की नहीं हथौड़ों की आवाजें आती है!सत्तासीन व्यक्तियों की हृदयहीनता और आम आदमी के प्रति दिखावटी सहानुभूति को शुक्ल जी की कविताओं में साफ तौर पर देखा जा सकता है। आपकी कविताएँ पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के फलस्वरुप उसके बनते बिगड़ते यथार्थ को विभिन्न रूपों में दर्ज कराती हैं।बाज़ार कविता से......।यह उसकी हिस्सेदारी बेचने का समय है/ जबकि लोग कहते हैं कि बाज़ार में उसकी हिस्सेदारी बढ़ी है/ वर्षों से जोड़ते घटाते गुणाभाग की तरह जिंदगी को पढ़ता हुवा/ बहुत थोड़ी सी पूंजी में जब वह उतरता है बाजार में/ लोग आश्वस्त होते हैं कि यह सबके विकास का समय है/दूसरी कविता....।पाँवों का इतिहास असल में मनुष्य की इच्छाओं का इतिहास है/ और मनुष्य की इच्छाएँ अपने समय के भूगोल से तय होती हैं/ जहाँ बाज़ार के उछलने के साथ/ पाँवों में भी उछाल आता है ! पृष्ठ संख्या 32 से….***************शुक्ल जी की कविताएँ एक तरफ लोक के समूचे परिदृश्य को लेकर चलती हैं, जिसमे घर, यात्रा, बुरे दिनों के ख़्वाब, धुआँ, स्त्री, पाँव छूने के किस्से, हवलदार, वसंत, वरुणा, गोठनी, पोई भाई, अक्षय लोक, और जीमूतवाहन जैसी महत्वपूर्ण कविताएँ हैं, तो एक ओर पक्का महाल पर आधारित बनारस जैसे शहर में हो रहे सांस्कृतिक क्षरण के खिलाफ़ (आम आदमी) मध्य व निम्म मध्यवर्ग की पीड़ा व टूटते प्राचीन खण्डहरों पर चलती छेनी हथौड़ों से चोट खाती निर्वासित जनता खासकर आम आदमी के साथ चलने के लिए आतुर दिखते हैं, और उनकी पीड़ा व संस्कृति पर गहरी चोट, जिसमे चीखते मानव व टूटते हुए खण्डहरों से अनेक अनुगूंजें प्रतिध्वनित होती हैं। सामाजिक, मानवीय पीड़ा से युक्त इस तरह की आपकी रचनाएँ मुक्तिबोध व निराला की रचनाओं की तरह प्राणशील होती हैं। और उनकी अनुगूँज तत्कालीन समाज व राजनीति को झकझोरती भी हैं, और सचेत भी करती हैं। यह अनुगूँजें भविष्यधर्मा भी होती हैं, जो आगे चलने का विकल्प उपलब्ध कराने का सामर्थ्य रखती हैं।आपकी कविताओं में मध्यवर्गीय पीड़ा व उनके जीवन द्वन्दों का भयावह चित्रण मिलता है, जिसमे शहरी मानवीय विडम्बनाओं का सटीक चित्रण हुवा है। जिसमे ख़ासकर बनारस जैसे शहर में निरंतर हो रहे तोड़-फोड़ व विस्थापन की त्रासद परिस्थितियों से जूझती जनता के आक्रोश की आवाज़ आपकी कविताओं में दर्ज है। इस प्रकार निरन्तर मिलती यातनाओं व यंत्रणाओं ने आम आदमी को ज़िद्दी बना दिया है,,,,,यातना एक ज़िद है/ जो यातना में होता है बहुत ज़िद्दी होता है/ जैसे कि हमारे पुरखे/ जिनकी ज़िद ही उन असंख्य घावों के लिए मरहम थी,,,,,,कवि के इस संग्रह की ज़्यादेतर कविताएं आज के कटु सत्य स्थितियों और उनसे उपजे अंतर्विरोधों पर प्रहार करती हैं। इस प्रकार पक्का महाल की लगभग सभी कविताएँ जो आपको अपने समकालीनों और परवर्तियों के काव्य संग्रहों से अलग पहचान बनाने व इसके विशिष्ट स्वाद देने वाले संग्रह के रूप में परिलक्षित होती है, जिसे पौढ़ एवं विचारशील मन से ही महसूसा जा सकता है।जिसमे उजड़ते हुए काशी का नक्शा व बिगड़ते हुए भूगोल को बचा लेने की एक असीम छटपटाहट सम्मिलित है।**************श्रीप्रकाश शुक्ल के पाँचवें काव्य संग्रह 'ओरहन व अन्य कविताएं' के सद्य प्रकाशित उनके छठे काव्य संग्रह 'क्षीरसागर में नींद' को पढ़ते हुए सहज ही यह अहसास होता है कि निश्चय ही शुक्ल जी का कवि धुर देहात से गांव, कस्बे, शहर व नगरों के अनुभवों से गुजरता हुवा महानगर की भागम भाग से निरंतर हो रहे सांस्कृतिक परिवर्तन के विरुद्ध आम आदमी के पक्ष में वे उनके अपने अस्तित्व के लिए संघर्षशील हैं। कवि श्रीप्रकाश शुक्ल को भली-भाँति समझने के लिए एक बार उनके काव्य विकाश पर भी गौर करना जरूरी है। क्योंकि कवि को यहाँ पता है कि राजनीति में घोषणाएं हवा हवाई होती हैं। इसी लिए वे दिखावे की राजनीति पर करारा तमाचा जड़ते हैं,,,,,,,,,,,,,जो शहर नही बदल पाए/ वो नाम बदल रहे हैं/ जिनको कचड़ा साफ करना था वो कपड़ा बदल रहे हैं/ जिन्हें गंगा को स्वच्छ करना था/ वे गौ की सुरक्षा पर जोर मार रहे हैं/पृष्ठ संख्या-94संस्कृति हमारी प्राण है, इसका विखण्डित होना आत्मा को चोटिल करने के समान है।संस्कृति का परंपरा से गहरा अंतःसंबंध है हाँ यह जरूर है कि केवल परम्परा ही संस्कृति नही हो सकती,,,, कुछ परम्पराओं के टूटने से हमारी सम्पूर्ण संस्कृति का अंत नही हो जाता, बल्कि कहीं-कहीं नए समाज के निर्माण में संस्कृति व परम्पराओं में थोड़ी-बहुत टूट-फूट कभी-कभी जरूरी हो जाता है। ऐसा ही बदलाव बनारस में हो रहा है जिसे समय, समाज व संस्कृति की चिंता करता हुवा कवि इस तरह के बदलावों की स्वीकृति नही देता, और इस विध्वंसकारी बदलावों से अंत तक जूझता है,,,,,,,,,,,इस प्रकार से इस संग्रह में धर्म के नाम पर सत्ता का दुरुपयोग करने वाले तानाशाहों के रवैये व उसके घातक परिणामों की चीख भी 'क्षीरसागर में नींद' में साफ-साफ सुनी जा सकती है। जिसका ज़बाब आने वाला वक्त ही देगा। लेकिन मेरा मानना है कि धार्मिक आस्था-अनास्था से मनुष्यता बहुत ऊपर की चीज है जो कवि को भीतर से संवेदित तो करती है परन्तु ऊपर से ऐसा नही दिखाई देता। खैर जो भी हो पर लोक के पक्ष में कवि बड़ी मजबूती के साथ खड़ा है, फिर भी सत्ता का भय कवि को सालता रहता है, जो कवि की संवेदनाओं में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। और यह संवेदना कवि के भीतर से ही संवेदित होती है जो कि कवि के विचारों को एक व्यापक आकार भी देती है।आपकी रचनाओं में निराला की भाँति विद्रोह के स्वर भी सुनाई देते हैं।*****************कवि श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताएं समय व समाज की परिधि में रहते हुए भी एक ऐसे रचना संसार का निर्माण करती हैं, जहां नैराश्य जीवन मे भी आशा का संचरण होने लगता है, हम यूँ कह सकते हैं कि आपकी रचनाएँ हमारे अंदर एक व्यापक उम्मीदों का संचरण कर देती हैं। वहीं उम्मीदें! जो इंशान को कभी मरने नही देती बल्कि मानव को महा मानव बनने में सतत प्रेरणापुंज का काम करती हैं,,,,जो कि 'दार्जिलिंग' 'सूर्योदय' व 'अक्षय लोक' जैसी कविताओं में देखी जा सकती हैं......।वह वर्षों से उग रहा था मेरे भीतर/बस उसे देखने की ऊँचाई ही नहीं थी मेरे पास/ जिसे तुमने सुलभ करायी/ ओ मेरे ज्योतिर्लिंग!सूर्योदय कविता में............।जो उछलता है मेरे भीतर/ अनंत की उम्मीद/ कोई और नही तुम ही होएक अन्य कविता 'अक्षय लोक' की निम्न पंक्तियां देखें,,,,,,यह कौन बताएगा कि वे आँखें अभी भी ताकती हैं राह/ इस उम्मीद से कि कोई कभी तो पूछेगा इनका हाल/ जो देवता के नाम पर अभी भी उपेक्षित हैं।बादल कविता की निम्न पंक्तियां देखें............।काले-काले बादल आए/भीतर मेरे उजले छाए/ धरती पर हरियाली छायी / दाना बिन सब रोएँ भाई,,,,,,यहाँ पर कवि की पंक्तियों से साफ़ स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं कवि के अंदर एक व्यापक उम्मीद है वहीं उम्मीद जो नागार्जुन की कविता 'अकाल और उसके बाद' में दिखाई देती है।यह कवि की वहीं उम्मीद है जो उसे स्वस्थ व मजबूत ही नही बनाती बल्कि इसे निरन्तर गतिशील भी बनाए रखती है।****************श्रीप्रकाश शुक्ल जी प्रकृति की निकटता के कवि हैं। क्योंकि उनकी निम्न कविताएँवरुणा, द्वा सुपर्णा, नल और बन्दर, वसंत, बादल व शोक सभा जैसी कविताओं को पढ़ने से साफ़-साफ़ ज़ाहिर होता है कि कवि को अपने प्रकृति व पर्यावरण की चिंता बरबस बनी ही नही रहती बल्कि कवि निरंतर अपने प्रकृति व पर्यावरण के प्रति सचेत भी रहता है।नल और बंदर कविता की चंद पंक्तियां देखें,,,,,,,,,,,,इस बंदर को नही पता था कि जिस समय यह पानी के लिए जूझ रहा था/ ठीक उसी समय संसद में पानी के संकट पर बहस हो रही थी/ और जल संरक्षण के सैकङों सुझाते उपायों के बीच/ गंगा के पानी को पीने लायक बनाने पर मंथन हो रहा थाइसी तरह शोक सभा कविता की कुछ लाइनें देखें......लेकिन मजेदार बात यह थी कि इस सम्पूर्ण शोक सभा में /नदी के स्तर को लेकर जो बहसें थीं/उसमे पानी का व्याकरण गायब था/और पानी की उपयोगिता को लेकर जो चिंताएँ थीं/उसमे पानी का मूल्य गायब था!इस प्रकार कवि को अपने प्रकृति व पर्यावरण की चिंता भी सालती रहती है, जो कवि को अपने प्रकृति के प्रति सचेत कवि होने का दर्जा देती है।एक पंक्ति बुरे दिनों के ख़्वाब कविता से देखें,,,,,,सब कुछ विकास मय है/ और मैं स्मार्ट होते शहरों में जंगल की हत्या देख रहा हूँ/ यह किसी देश का संकट नही है मित्रों/ ये तो बुरे दिनों के ख़्वाब हैं/ जो अच्छे दिनों की तमन्ना में छन कर आ रहे हैं।इस प्रकार कवि तमाम प्रतिरोधी तेवरों के बीच भी प्रकृति के रक्षार्थ खड़ा कवि प्रकृति की शास्वत स्वरूप को ही नही बतलाता बल्कि उसके दोहन से होने वाले भयावह दुष्परिणामों से भी अवगत कराता है।संग्रह में कवि ने अपने प्रिय कवि केदारनाथ सिंह जी व लोक कलाकार 'पोयी भाई' को याद करना नही भूलते, बल्कि उनके जीवनानुभवों व उनसे जुड़े लोकपक्षों को भी जीवन्त कर दिया है।*****************आपकी रचनाएँ सतही धरातल पर चलते हुए भी तमाम राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विडम्बनाओं से अवगत कराती हैं। जिन्हें पढ़कर मानव मन व मस्तिष्क स्वतः ही पिघलने लगता है, और उसे एक नये सामाजिक संरचनाओं का ताना-बाना बुनने के लिए बाध्य कर देता है। जिससे पाठक के अंदर एक अजीब सी हलचल होने लगती है। और यहीं हलचल हमे एक ख़ास अंतरंग भरे व्यापक संवादों में शामिल कर देती है।आपकी कविता में प्रकृति प्रेम, लोकजीवन,करुणा,आक्रोश, राजनीतिक संघर्ष तथा एक व्यापक व विद्रोही तेवर भरा हुवा है। फिर भी आपकी कविता में शब्दों की पुनरावृत्ति नही होती और न ही फालतू शब्द दिखाई पड़ते हैं।पृष्ठ संख्या बारह घर कविता पढ़ते हुए त्रिलोचन जी याद आ जाते हैं। उनकी एक कविता 'पूरी पृथ्वी मेरा घर है' लेकिन मैं अपने घर को नही जानता। और यहाँ श्रीप्रकाश जी लिखते हैं कि...घर के भीतर ही हमारी दुनिया है/ और हम समझते हैं हम घर से दूर हैं/ शायद बहुत बाहर भी!****************क्षीरसागर में नींद में एक कविता 'स्त्री' को पढ़ने से थोड़ी बेचैनी होने लगती है। किन्तु कविता के अंत मे दिए गए स्पष्टीकरण से थोड़ी राहत मिलती है और पुनः कविता पढ़ने पर सत्य छनकर स्वयमेव बाहर आ जाता है,,,,,, स्त्री विमर्श के सन्दर्भों पर कवि श्रीप्रकाश की कविता अपने मुहावरे पर सटीक बैठती है जो कि अपने पाठकों के उपर प्रभाव भी छोड़ते नज़र आ रही है। कवि ने स्त्री पक्ष व उसके कार्य-व्यवहारों को बिना बदलाव किये बड़ी ही शिद्दत के साथ रखा है........।दिन भर कपड़ा कचारना/ तह लगाना/ कपड़ों पर स्त्री करना/ स्त्री हो जाना है/बीच-बीच में बुदबुदाना/ कभी-कभी बड़बड़ाना/ स्त्री होकर भी स्त्री का भरम तोडना है........।यहाँ एक स्त्री का स्त्री होना उसके अपने आप मे संपूर्णता का बोध कराता है, और उसके भ्रम को भी तोड़ता है, साथ ही उसे अपने कर्तव्यों के प्रति कवि आग़ाह करना चाहता है, जिसके कारण वह स्त्री की पूर्णता को प्राप्त भी करती है। वह कविता में मुक्त ही नही होना चाहती बल्कि स्वयं मुक्ति के तमाम आयामो से गुज़रते हुए कर्मो के बंधन में बंधे हुए मुक्त होने की आकांक्षा बलवती दिखाई देती है। जहाँ पर उसकी कर्तव्यनिष्ठा, प्रेम, करुणा, सहयोग, व समर्पण स्पष्ट दृष्टिगत होता है। लेकिन आपकी रचनाओं में जहां स्त्री पुरूष की वर्जनाओं को झेलने व उसकी सहचरी बनकर चलने के लिए लिए आतुर दिखती है, तो वहीं वह 'आंदोलन' जैसी कविता में अपने ख़िलाफ़ बोलने व देखने वालों के विरुद्ध खड़ी नज़र आती है,,,,,,,,आंदोलन कविता का एक अंश देखें....उनकी इस बेशर्मी को लड़कियों ने गंभीरता से लिया/ और खुद के झुकने के विरूद्ध वे/ तन कर खड़ी हो गयीं,,,,,इस प्रकार आपकी कविता में स्त्री के कठोर व कोमल दोनो रूप देखने को मिलते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे सुमित्रानंदन पंत जी की कविता में स्त्री के दोनों रूप दिखाई देता है। यहीं नही कवि ने 'जीमूतवाहन' नामक कविता में स्त्री को वात्सल्यमयी मां के रूप में भी चित्रित किया है, जो अपने बच्चे के लिए मंगलकामना करती है,,,एक माँ इस तरह भी जीवित रहती है अपनी संवेदनाओं में/ और एक भूले हुए इतिहास में सिसकियाँ भरती/अपने बच्चे की मंगलकामना करती है जीवित वर्तमान में,,,,,,पृष्ठ संख्या 90 पर,,इस प्रकार कवि की कविता में स्त्री मातृ व भार्या एवम भगिनी तीनो रूपों में विद्यमान रहती है, यह कवि व पाठक दोनो के लिए सुखद आश्चर्य की बात भी है।आपकी कविताओं में बनावटीपन रंच मात्र भी नही दिखाई देता। आप घटनाओं को सरल व सपाटबयानी शब्दों में पाठक वर्ग के सामने परोस देते हैं, जिसे चख कर उसकी जिज्ञासाएँ और बलवती हो जाती हैं।***************************शुक्ल जी की कविताएँ जहाँ दर्शन का बोध कराती हैं वहीं रहस्यों के गहन खोह में ले जाती हैं। जहां पर पाठक भयभीत नही होता बल्कि अपने आंतरिक मनः शक्तियों के द्वारा नवीन व अभीष्ट वस्तु को प्राप्त कर के ही बाहर निकलता है।'हे महाश्मशान!' 'देव दीपावली' व 'नागा बाबा आए हैं' और 'बादल' जैसी कविताएँ अपने लयात्मकता को लिए निर्बाध व स्वच्छंद गति से बहती हुई कवि की आंतरिक भावनाओं को व्यक्त करने में सफ़ल हुई हैं। हाँ यह जरूर है कि आपकी कविताओं में छंदों के बंधन की मुक्ति को नकारा तो नही जा सकता फिर भी आपकी कविता छंदों के बंधन से मुक्त होने की होड़ में गंगा की धारा के सदृस अपनी लयात्मकता के साथ निर्बाध गति से बहती हुई साहित्य के अथाह सागर में मिलने को आतुर दिखती है। आपकी भाषा-शैली व बुनावट एक अलग अंदाज़ में चलते हुए भी अपनी ज़मीन से जुड़ी रहती है। आपकी भाषा परिष्कृत व सजीव है, तथा आपकी कविताओं में लाक्षणिकता का विकसित स्तर भी देखने को मिलता है। साथ ही लोकभाषा की मिठास और मधुरता का घोल, शिव जी के प्रसाद स्वरूप व्यापक किन्तु हल्की नशीली ठंढई जैसी मादकता से युक्त सत्यम शिवम सुन्दरम का स्वरूप साकार करते हुए आपकी रचनाओं में प्राण फूँक देती है। जिसमे कहीं गंगा शिव से मिलने के लिए आतुर दिखती हैं तो कहीं शवों को मुक्त करते हुए शिव का साकार रूप दृष्टिगोचर होता है, तो कहीं शिव स्वयं मुक्त होते नज़र आते हैं,,,,,,, किन्तु यह वहीं मुक्ति धाम है जो स्वयं शिव जी के त्रिशूल पर बसा है जिसे हम मस्ती भरे अंदाज़ में बनारस कहते हैं।***************************प्रस्तुत संग्रह में कुछ पिता-सिरीज की भी कविताएँ शामिल हैं जिनको पढ़ने से एक अलग ही आनन्द का बोध होता है, जो धूप में चलते हुए राहगीर के लिए एक घने व छायादार सुकून देने वाले बरगद के पेड़ सा प्रतीत होता है। जिसमे पाठक भी आनन्द देने वाली छाया सा महसूस करता है। कविता में एक निश्चित अवस्था को पार करते बेबस बीमार पिता को खुद की चिंता व लाचारी का भी भावबोध दृष्टिगत होता है, यहां कवि को स्वयं बोध होता है कि पिता के होने का मतलब हज़ार सुखों के समान है। निम्न कविता में वृद्धावस्था की ढ़लान पर पहुंचते पिता को अपने स्वास्थ्य की चिंता बरबस सालती रहती है, जो स्वयं कवि को भी चिंतित कर देती है। कवि के अंतर्मन में पिता के प्रति उठने वाले संशय व पीड़ा को भी साफ तौर पर देखा जा सकता है, जो कवि का बुजुर्गों के प्रति व्यापक सम्मान को भी दर्शाता है।'देवदारू पिता',,,पिता उदास हैं बार-बार फेरते हैं अपना हाथ अपनी त्वचा पर/जैसे एक देवदारु खुद की झुकी हुई शाखाओं को व्यवस्थित कर रहा होयहाँ पिता की चिंता खुद के प्रति नही बल्कि अपने बच्चों के प्रति है, जो एक छायादार देवदारु के वृक्ष की भाँति दिखाई दे रहा है।हालाँकि पिता-सीरीज की कविताएं कवि के पांचवें संग्रह 'ओरहन' में पेड़ और पिता शीर्षक व अन्य में भी वर्णित मिल जाता है पर क्षीरसागर में नींद के पिता 'ओरहन' की अपेक्षा कुछ परिपक्व नज़र आते हैं। जिसे हम कवि के विकासक्रम से जोड़कर देख सकते हैं। जिसमे 'अलसाई उम्मीदें' पहरे पर पिता, पिता की रुलाई, देवदारु पिता आदि में देखा जा सकता है। चाहे जो भी हो पर यहाँ कवि खुद को किसान का बेटा कहलाने पर गर्व करता है, और कवि को राजपुत्र कहलाने का गौरव भी प्राप्त है।इस संग्रह में कुल मिलाकर एकसौ दस कविताएँ हैं, जिसमे लोक का पक्ष काफी भारी पड़ता है। यहीं लोक से जुड़कर चलने की व्यापक सोच आपको नागार्जुन के समकक्ष ला देती है। आपकी हर कविता अपने अनूठेपन के कारण पठनीय है, जिससे उसका महत्व स्वतः ही बढ़ जाता है। संग्रह में कुछ छोटी-छोटी कविताएँ भी हैं, पर ये एक दूसरे से कमतर नही बल्कि लघुता में प्रभुता को समेटे हुए पाठकों पर अपना प्रबल प्रभाव डालने में सफ़ल होती हैं।संग्रह की कविता 'देव दीपावली' पढ़ते वक्त जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' मानस पटल पर छा जाती है। जिसमे वहीं लयात्मकता व भावबोध होने लगता है।सब मिलाकर कवि का यह संग्रह अपने आप में एक बहुआयामी संग्रह है जो साहित्य के सर्वांगीण पक्षों को समेटा हुवा है।अंत मे मैं यहीं कहना चाहूंगा कि शुक्ल जी की कविताओं को स्वान्तः सुखाय की भावना से भले न देखा जाए, पर उसे 'काव्यम यशषे अर्थ कृते व्यवहार विदे शिवेतर रक्षितये' की दृष्टि से जरूर देखना होगा।📚✍️पुस्तक 'क्षीरसागर में नींद' (कविता संग्रह)प्रकाशन वर्ष - 2019प्रकाशक - सेतु प्रकाशनमूल्य- 112 ₹✍️सर्वाधिकार सुरक्षित:मनकामना शुक्ल 'पथिक' वाराणसी।युवा कवि,आलोचकEmail.mkshukla2586@gmail.com