कवि केदारनाथ सिंह की कविताओं मे लोक-सौंदर्य।

     
    "केदारनाथ सिंह की कविताओं में लोक सौन्दर्य"
कवि केदारनाथ सिंह के विराट क्रियाशील-काव्य व्यक्तित्व एवं अप्रतिम प्रतिभा की पहचान उनकी कविताओं से ही हो जाती है।समकालीन काव्य आन्दोलन में लोक जगत एवं उससे जुड़े समस्त सौन्दर्यों  को उद्घाटित करने व उससे गहरा जुड़ाव रखने वाले कवि केदारनाथ का जन्म 7 जुलाई 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गाँव में हुवा था ।
कवि केदारनाथ जी का रचना समय 1952-53 के आस -पास से सुरु होकर 2018 अपने अन्तिम समय तक फैला रहा जो समकालीन कविता को एक व्यापक नई दिशा व गति प्रदान करता रहा है। कवि केदारनाथ सिंह जी अकाट्य प्रतिभा के धनी थे उन्होंने काव्य के साथ -साथ आलोचनाओं पर भी समान रूप से लेखन किया साथ ही बनारस से निकलने वाली अनियत कालिक पत्रिका "हमारी पीढ़ी" से भी सम्बद्ध रहे, किंतु उनके प्रतिभा की मूल पहचान उनकी कविताओं से खासकर गाँवईपन व अपने लोक से गहरे लगाव के कारण मानी जाती है।
केदारनाथ सिंह की कविताएं समकालीन हिंदी काव्य परिदृश्य में अपने काव्यगत,मूल्यगत, नैतिक गरिमा व लोक रंजक पद्धति सम्बन्धित वैशिष्ट्य के लिए, भक्तिकाल व छायावाद के ही
समान सर्जनात्मक काव्यधारा मानी जाती है।
तीसरे तारसप्तक 1959 के महत्वपूर्ण कवियों में केदारनाथ सिंह जी ऐसे विरले कवि हैं जो आम आदमी के खासकर लोक व उनके हितों के प्रति प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जो कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नही करते बल्कि उसी लोक में जीने मरने की जहमत उठाते हैं। उनकी भाषा मे दरिद्रता नही बल्कि व्यापकता व उसमे आम व्यक्ति के होने की लोक रंजकता का सुखद एहसाश प्रतीत होता है। केदार जी के कृतित्व व व्यक्तित्व दोनों में लोक पक्ष का सम्पूर्ण सौन्दर्य साफ-साफ दिखाई देता है।
इस सम्बंध में उनका एक मत दृष्टव्य है -- "मैं गाँव का आदमी हूँ और दिल्ली में रहते हुए भी एक क्षण के लिए भी नही भूलता कि मैं गाँव का आदमी हूँ" यह गाँव का होना कोई मुहावरा नही बल्कि इसके बिपरीत मेरे जीवन की एक गहरी लगाव भरी वास्तविकता है जिसे मैं अनेक स्तरों पर जीता हूँ साल में कम से कम एक डेढ़ महीने मैं गाँव में गुजारता हूँ और वहाँ सुख-दुख का हिस्सा लेता हूँ। दरअसल मुझे लगता है कि मेरे भीतर एक सहज किसान के लगाव काम करते हैं और यह अकारण नही है कि उससे जुड़े हुए अनेक संकेत शायद मेरी रचनाओं में भी ढूंढ़े जा सकते हैं इसके साथ ही एक बात और महशूस करता हूँ और वह यह कि हिन्दी कविता की अपनी परम्परा सुरु से ही गाँव से जुड़ी रही है।
लोक की एक खास विशेषता यह है कि उसकी अपनी विरासत लिखित न होकर मौखिक होती है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार समय को चीरती हुई अविरल गति से चलती रहती है।
डॉ. श्यामसुंदर दुबे ने लिखा है- "लोक संस्कृति में निरन्तर प्रयोग की जीवन्त प्रक्रिया सन्निहित रहती है।अतः वह अपने सांस्कृतिक आयामों में परम्परा-विच्छिन्नता के अंतरालों से खण्डित नही हुई है।यह एक अलग बात है कि लोक संस्कृति के आदिम प्रवाह के प्रतीक तीर्थ हमारी दृष्टि से ओझल होते गये हैं"
कवि केदारनाथ सिंह जी की कविताओं में लोक से संबन्धित संपूर्ण वस्तु,स्थान,शब्द व संस्कृतियाँ स्वतः अपना स्थान ग्रहण करती गयी हैं।
केदारनाथ सिंह अपनी कविताओं में लोक को लेकर अत्यन्त सजग हैं। उनके लिए उनका लोक सिर्फ गाँव या गाँव की संस्कृति नही है, उन्होंने अपनी कविता में इस संस्कृति को एक गरिमा और ऊँचाई प्रदान की है ।
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का कहना है कि केदारनाथ सिंह की कविताओं में नदी,नाले,फूल,जंगल,तट, धूप,सरसों के खेत,धानों के बच्चे,बन,सांध्यतारा,बसंत, फागुनी हवा,पकड़ी के पात, कोयल की कुक,पुरबा-पछुवा हवा, शरद प्रात,हेमन्ती रात,चिड़ियाँ, घास,फुनगी,बहुरूपी प्रकृति संसार रूपायित मिलेगा, कवि के लोक की एक खास विशेषता यह है कि वहाँ के लोग समूह में विश्वाश करते हैं, गरीबी व अभाव के बावजूद उनकी आँखों मे एक तरह की चमक है और किसी भी संकट से भीड़ने-लड़ने का अदम्य उत्साह भी--- पानी से घिरे लोग,टमाटर बेचती बुढ़िया या माझी का पुल जैसी कविताऐं उनका ज्वलंत उदाहरण हैं। उनकी कविताओं में लोक का सम्पूर्ण तत्व विद्यमान है जो लोकजीवन की वास्तविकता व यथार्थता का बोध कराता है तथा मानव के आन्तरिक सम्वेदनाओं को भी झंकृत कर देता है जिसमे स्वयमेव अपनापन का बोध होने लगता है-माँ के हाँथों सेकी जा रही रोटी की गंध , मेड़ों पर बैठकर सतघरिया का कलेवा करते मजदूर, घास चरते बैल, भुसों की गंध, धान व तम्बाकू के खेत, बचपन के गाँव की गलियाँ, धानों की बालियाँ, भेंड़ व बकरियाँ, और संगठन की एक तेज व आदमी को खुद को गाँव का होने का गर्व जिसमें गाँव का ही नही बल्कि सम्पूर्ण मानवीय चेतना से युक्त लोक के विविध पक्षों का सौंदर्य उद्घाटित होने लगता है।
केदार जी अपनी जीवनशैली को भारतीय किसान से सीखते हैं लोक की अनुभूति उन्हें लोक-मिथकों धारणाओं एवं दंत कथाओं से जोड़ती है। वे किसान पिता की उस सीख को और उससे व्यंजित होने वाले जीवन मूल्यों को नये मुहावरों से बांधने की चेष्टा करते हैं जिसमे आदि से अंत तक लोक सौंदर्य दृष्टिगत होता है--
"मेरे बेटे
कुएँ में कभी मत झाँकना
जाना
पर उस ओर कभी मत जाना
जिधर उड़े जा रहे हों
काले-काले कौए
हरा पत्ता
कभी मत तोड़ना
और अगर तोड़ना तो ऐसे
कि पेड़ को ज़रा भी
न हो पीड़ा
रात की रोटी जब भी तोड़ना
तो पहले सिर झुकाकर
गेहूँ के पौधे को याद कर लेना
कभी अँधेरे में
अगर भूल जाना रास्ता
तो ध्रुवतारा पर नहीं
सिर्फ़ दूर से आनेवाली
कुत्तों के भूँकने की आवाज़ पर
भरोसा करना
मेरे बेटे
बुध को उत्तर कभी मत जाना
न इतवार को पच्छिम"
इस प्रकार लोक में व्याप्त समस्त सौन्दर्यों के ताजे व सूक्ष्म चित्र केदार की कविताओं में अत्यधिक मिलेंगे 'दुपहरिया' 'फागुन के गीत' 'बसन्त गीत' 'पात नये आ गये' 'धानों के गीत' 'रात' 'विदागीत' आदि प्रसिद्ध गीतों तथा अन्य कविताओं में कवि की भाषा,लय और बिम्ब योजना की विशिष्टता लक्षित की जा सकती है। उनकी भाषा मे लोक जीवन की भीनी गंध है यह गंध भी एक खास अंचल की है जिसे भोजपुरी अंचल कह सकते हैं  केदारनाथ सिंह जी गाँव से शहर चले आते हैं लेकिन उनके मन में उनका गाँव पूरी तरह से रचा बसा रहता है चलते फिरते उठते बैठते उसी की समृत्तियों में बरबस खोये रहते हैं, उनका मानना है कि गाँव के लोग सभ्य होते हैं उनमें संगठन की नींव है कवि की इसी ग्राम्य चेतना में लोक चेतना समाहित है। इस लोक की वास्तविक भाव भूमि उनकी 'देश और घर' नामक कविता है, जिसमें लोक की वास्तविकता साफ- साफ दिखाई पड़ती है ।
"हिन्दी मेरा देश है
भोजपुरी मेरा घर
घर से निकलता हूँ
तो चला जाता हूँ देश में
देश से छुट्टी मिलती है
तो लौट आता हूँ घर"
इस तरह से हम देख सकते हैं कि कवि का सम्पूर्ण जीवन लोक में ही रचा बसा हुवा है।
केदार जी की एक कविता जो 'अकाल और सारस' में संकलित है कि जब गाँव के लोग शव को फूँक कर आते हैं तो लोक में प्रचलित परम्पराओं के अनुसार हर रश्मों को अपने सांस्कृतिक परम्पराओं के अनुरूप बड़ी ही निष्ठा के साथ पूरी करते हैं।
'न होने की गंध' नामक कविता की पँक्तियाँ
"उस घर के किवाड़
अब भी खुले थे
कुछ नही था सिर्फ़ रश्म के मुताबिक
चौखट के पास धीमे-धीमे जल रही थी
थोड़ी सी आग
और उससे कुछ हट कर
रखा था लोहा
हम बारी-बारी
आग के पास गये और लोहे के पास गये
हमने बारी-बारी झुककर
दोनो को छुवा
यों हम हो गये शुद्ध
यों हम लौट आए
जीवितों की लम्बी उदास बिरादरी में"
अकाल और सारस में ही संकलित एक अन्य कविता जिसमे लोक का मार्मिक पक्ष उद्घाटित होता है। जिसमे कवि ने लोककथा का ज़िक्र किया है जो कि वह सदियों से हमारे लोक में प्रचलित रहा है। कवि केदार जी ने इस कविता में लोक की विडम्बनाओं को बड़ी ही निर्भयता के साथ प्रस्तुत किया है यहीं लोक जिसमे वे स्वयं से प्रश्न करते नजर आते हैं जिसमे उनका समूचा मानव समाज व सम्पूर्ण वातावरण स्वयं उपस्थित रहता है यह उनकी अपनी एक  शैली थी ।
केदारनाथ सिंह की कविताओं में लोक जीवन की विराट शक्ति व सौन्दर्य स्पष्ट रूप से निखर कर पाठकों के मानस पटल पर स्वयमेव अंकित हो जाता है । उन्होंने अपनी कविताओं में लोक के सर्वांगीण पक्षों को बड़ी ही सरलता व सहजता के साथ उकेरा है 'तीसरा सप्तक' से लेकर 'सृष्टि पर पहरा' तक की उनकी कविताओं में लोकचेतना का स्वर सुना जा सकता है । जिसमें कवि ने बड़े ही आत्मीयता के साथ व्यक्त किया है।
"रुको आँचल में तुम्हारे
यह समीरन बाँध दूँ, यह टूटता प्रन बाँध दूँ !
एक जो इन उँगलियों में
कहीं उलझा रह गया है
फूल-सा वह काँपता क्षण बाँध दूँ!"
केदारनाथ जी का अपने गाँव व वहाँ के लोगों से अत्यधिक लगाव उन्हें दिल्ली से बलिया जिले के उस चकिया गाँव में बरबस ही खींच लाता है जहाँ के मानव व मिट्टी से लरिकईयाँ से ही उनका बेहद आत्मीय सम्बन्ध रहा है यहीं कारण है कि उनकी कविताओं में उनके गाँव के कई लोग अनायास ही आते रहते हैं जैसे, झपसी, लालमोहर, कैलाशपति निषाद आदि । तात्पर्य यह है कि केदार के कविता की एक बहुत बड़ी जमीन जिसमे उनका गाँव या लोक है, जो उनकी कविता में बार-बार अवतरित होता है, अपने पूरे समूह अपनी पूरी लयबद्धता, संघर्ष और जिजिविषा के साथ और यह गाँव तब सिर्फ गाँव नही रहता बल्कि एक पूरे लोक या सम्पूर्ण विश्व का प्रतिनिधि बन जाता है। केदार की कविता के गाँव की यह एक अद्वितीय विशेषता है जो उनके समकालीन कविता और कवियों में दुर्लभ है ।
भूतों के बारे में लोक में एक तरह का अन्धविश्वाश सर्वविदित है। लोक संस्कृति का एक अभिन्न अंग रहा है यह लोक विश्वाश जब केदार की कविता में प्रकट होता है तो किस तरह इसका बढ़िया उल्लेख डॉ. विजयमोहन सिंह ' तालस्ताय और सायकिल' पर लिखते हैं-- "भुतहा बाग के भूत भी भाग गए हैं कहीं और रहने की खोज में।..गाँव के ये भूत इतने निरीह और गरीब होते थे कि रास्ते में किसी राही से महज़ कभी -कभी माँग लेते थे " चुटकी भर सुर्ती या महज एक बीड़ी" इस तरह के लोक विश्वास केदार जी की कविताओं में यत्र - तत्र मिल ही जाते हैं। उनकी एक कविता में ' एक हल्दी से रंगे ताजे दूरदर्शी पत्र- सा ' का जिक्र आता है इस कविता में कवि ने कोई और बात कहने के लिए हल्दी-रंगे पत्र का व्यवहार किया है। लोक में यह विश्वाश है कि कोई पत्र यदि हल्दी रंग में रंग कर आता है, तो वह कोई शुभ समाचार लेकर आता है। आज भी गाँवों में कोई जब कोई शुभ संदेश देना होता है तो उसे लिख कर उसपर हल्दी के छींटे मार कर ही दिए जाते हैं। हल्दी सदियों से लोक में एक शुभ वस्तु के रूप में मौजूद रही है बिना हल्दी के ना तो वैवाहिक रश्म पूरे होते हैं, खोईछा भराता है, और न ही चुमावन होता है, कई बार तो परदेश जाते समय लोग अपनी गांठ में एक हल्दी बांध लेते हैं, इस विश्वाश के साथ कि इस तरह उनकी यात्रा शुभ हो जाएगी।
उनकी कविता "अकाल और सारस" की कुछ पंक्तियाँ
"छू लूँ किसी को
लिपट जाऊँ किसी से?
मिलूँ
पर किस तरह मिलूँ
कि बस मैं ही मिलूँ
और दिल्ली न आए बीच मे"
यहाँ पर कवि का अपनों के प्रति आत्मीय लगाव जो एक तडफ़ सा प्रतीत हो रहा है जिसमे सिर्फ और सिर्फ अपने गाँव व अपने लोगों से लिपट जाने उन्हीं का हो जाने की आकांक्षा बलवती प्रतीत होती है जो इस अपने लोक के पावन भाव भूमि के आत्मीय संदर्भों में दिल्ली या अन्य किसी को भी नही आने देने की ज़िद कवि की अदम्य ईच्छा शक्ति को कवि को गहरे लोक में ले जाता है।
केदार जी ने इस लोक की शक्ति को पहचाना है और अपनी रचनाओं में संजोया भी केदार जी 'लोक' की शक्ति को उजागर करते हैं लोक के इसी सामर्थ्य को उद्घाटित करने के उद्देश्य से वे लोक संवेदना को महत्व देते हैं। लोक भाषाएँ न केवल किसी मानक भाषा को समृद्ध करती है बल्कि वे विभिन्न लोकभाषी जनों को भावात्मक एकता के सूत्र में पिरोती हैं 'गाँव आने पर' नामक कविता में गाँव से कवि का आत्मीय जुड़ाव दिखाई पड़ता है। इस कविता में कवि ने गाँव के बने रहने की ईच्छा जाहिर की है। अपने लोगों के बीच अपनत्व में जीना चाहा है। जिसमे एक गहरा आकर्षण है कवि का अपने गाँव से--जो उसके  लोक सौन्दर्य को और ही व्यापक कर देता है।
"क्या करूँ मैं ?
क्या करूँ, क्या करूँ कि लगे
कि मैं इन्हीं में से हूँ
इन्ही का हूँ
कि यहीं हैं मेरे लोग
जिनका मैं दम भरता हूँ कविता में
और यही,यही जो मुझे कभी नही पढ़ेंगे"
केदार जी के काव्य कर्म का जीवन अनुभव काफी प्रबल रहा है।उनकी कविताओं में कस्बाई जीवन व वहाँ के लोगों से जुड़ाव उनके सुख दुःख में सहभागी होने व स्वयं वहां की मिट्टी व भाषा से गहरा लगाव व उनके संघर्षों की सतत प्रकृया उनके जीवन अनुभवों का हिस्सा रहा है, जो सदैव उनकी कविताओं में लोक की गंध को बिखेरता रहता है। उनकी एक कविता " हीरा भाई" जिसमे कवि ने अपने गाँव के साथी के माध्यम से वहां के लोगों की बुनियादी चिंता को बड़ी ही सत्यता के साथ व्यक्त किया है।
"एक पूरा चरक- संहिता होता था
उनका जर्जर थैला
जिसमे मवेशी भी ठीक हो जाते थे
और कभी-कभी आदमी भी
आदमी और पशु के बीच के
अंतिम लचकहवा पुल थे हीरा भाई।"
उनकी एक और कविता -- "अगर इस बस्ती से गुजरो" 'जैसे दिया सिराया जाता है'  'माँझी का पुल'  'पर्व स्नान' आदि कविताओं को साथ मिलकर पढ़ा जाय तो केदार जी का लोक तथा उसका वास्तविक सौन्दर्य अधिक स्पष्ट हो जाता है।
सब मिलाकर नई कविता के इस महान कवि की कविताओं में लोक के बहु आयामी तत्वों व उनके जीवन से जुड़ी वास्तविकताओं की बड़ी तादात है जो लोक व उसके भाव भूमि को और अधिक सुगठित कर देती है। उनकी कविताएं लोक से गहरे संपृक्त हैं केदार जी लोक से कविता रचने की ऊर्जा पाते हैं जो शायद यहीं कारण है जो उन्हें लोक के बेहद करीब होने ही नही बल्कि उसी में जीने मारने की सत्यता को सिद्ध भी कर देती है।
व्यक्तित्व एवं कृतित्व--
नई काव्य परम्परा के इस लोकधर्मी कवि का व्यक्तित्व व कृतित्व दोनों अपने आप में बहुत कुछ समाहित किया हुवा है । कवि केदारनाथ जी सरल एवं सादगी भरे जीवन के अभ्यासी श्रेष्ठ व्यक्तित्व थे। यहीं कारण था कि वे अपने युग के कवियों से अलग ही नजर आते थे नई कविता जगत के इस बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न कवि का जन्म सात जुलाई 1934 में बलिया जिले के चकिया नामक गाँव मे एक साधारण किसान परिवार में हुवा था इनके पिता जी का नाम डोमन सिंह और माता का नाम लालझरी देवी था केदार जी की आरम्भिक शिक्षा गाँव के ही पाठशाला में सम्पन्न हुई इसके बाद वे हाईस्कूल से एम.ए. तक कि शिक्षा बनारस में ग्रहण किये स्नातक उदय प्रताप कालेज व परास्नातक काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्राप्त किये, इसके उपरान्त 1964 में साहित्य जगत के ख्यातिलब्ध साहित्यकार प्रो० पं० हजारी प्रसाद द्विवेदी निर्देशन में(आधुनिक हिंदी कविता में बिम्बबिधान ) विषय पर विधिवत पी०एचडी उपाधि ग्रहण किये ।
कुछ समय के उपरान्त उन्होंने अपनी पहली नौकरी परडौना में 1969 में आरम्भ किया गया इसी दौरान इनकी पत्नी का स्वास्थ्य काफी खराब हो गया उपचार के बाद भी सेहत में सुधार नही हुवा और अंत मे उनकी कुछ ही दिनों में मृत्यु हो गयी, जो कि केदार जी के जीवन के लिए एक अपूरणीय क्षति रही, इसके कुछ समय के पश्चात केदार जी अपने अकेलेपन से मुक्ति पाने के हेतु गोरखपुर के सेण्ट एड्यूज कालेज में सेवा देने लगे, इसी दौरान उनकी न्युक्ति देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जवाहरलाल नेहरू नई दिल्ली में हिंदी विभाग में हो गयी । कवि केदार जी के परिवार में पाँच बेटियाँ और एक बेटा भी है । उन्होंने अपने लेखन का आरम्भ 1952-53 के आस - पास सुरु किये जो अन्तिम क्षणों तक जारी रहा । केदार जी का अपने गाँव वालों से बेहद जुड़ाव व वहाँ की लोक संस्कृति से बेहद लगाव रहा शायद यहीं कारण था कि वे दिल्ली रहते हुए भी अपने गाँव व गाँव के लोगों में खोए रहते थे और गर्मी की छुट्टियाँ गाँव मे ही बिताते थे । केदार की कविताओं में लोक से सम्बंधित सम्पूर्ण सौन्दर्य हर स्थल पर अपनी सुन्दरता को बिखेरते मिल जाते हैं जो कवि को उसके लोक के धरातल पर होने की वास्तविकता का बोध कराते हैं ।
केदार जी की भाषा हिन्दी थी उन्होंने काव्य के साथ-साथ आलोचनाओं पर भी काम किया साथ ही एक कुशल संपादक के रूप में अपनी भूमिकाओं का भी निर्वहन करते हुए कई भाषाओं के कवियों की कविताओं का भी अनुवाद कर ख्याति प्राप्त किए। इनकी अध्यापकीय व लेखकीय कर्मशीलता के कारण इन्हें कई पुरस्कारों से पुरस्कृत भी किया गया । केदारनाथ सिंह जी अज्ञेय के संपादकत्व में छपने वाली बहु प्रतिष्ठित कविता संकलन तीसरा सप्तक 1959 के प्रमुख सहयोगी कवियों में एक हैं, इनकी कविताओं के अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन और हंगेरियन आदि विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं ।
केदार जी को कविता पाठ के लिए दुनिया के अनेक देशों में आमंत्रण मिलता रहा और वे इसमे कभी चूके नही ।
केदार जी के प्रमुख कविता संग्रह- अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही, यहाँ से देखो, बाघ, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, तालस्ताय और साइकिल आदि हैं । उन्होंने आलोचना पर भी खूब लेखन किया, इनकी प्रमुख आलोचना पुस्तकें हैं--- कल्पना और छायावाद, आधुनिक हिंदी कविता में बिम्बबिधान, मेरे समय के शब्द, मेरे साक्षात्कार आदि प्रमुख हैं ।
केदार जी ने कई पुस्तकों का सम्पादन भी किया, जिसमे ताना- बाना, आधुनिक भारतीय कविता में एक चयन, समकालीन रुसी कविताएँ, कविता दशक, साखी (अनियत कालिक पत्रिका) शव्द (अनियत कालिक पत्रिका) प्रमुख हैं केदारनाथ जी का बनारस से निकलने वाली अनियत कालिक पत्रिका हमारी पीढ़ी से भी सम्बद्ध रहे ।
कवि केदार जी हिंदी के ऐसे विलक्षण कवि थे जिन्होंने हिंदी कविता को समृद्ध करने के साथ- साथ ही एक नई परम्परा  को जन्म और कई पीढ़ियों को कविता का संस्कार दिया । वे लोक जीवन को आधुनिकता के अनुभवों के साथ पिरोकर ऐसा संसार रचते थे कि कविता स्वयं ही चमक उठती थी, उनके लोक की जड़ें यू०पी० और बिहार में थी लेकिन उनके इस लोक का विस्तार समूचे वैश्विक पटल पर छाया रहा , शायद यहीं कारण था कि रघुवीर सहाय ने उन्हें विश्व कविता का बड़ा हस्ताक्षर मानते थे । केदार जी की खास बात यह थी कि वे जटिल से जटिल विषयों पर भी बेहद सरल और आम भाषा जिसे (लोकभाषा कहते हैं ) में लिखा करते थे,  इस तरह उनकी लेखन शैली, कार्यशैली व जज्बातों के कारण ही उन्हें कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों से सम्मानित किया गया जिसमें भारत का सर्वोच्च साहित्य सम्मान भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार भी शामिल है । साथ ही साहित्य अकादेमी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान( मध्य प्रदेश) कुमार आशान सम्मान ( केरल ) दिनकर पुरस्कार (बिहार) जीवन भारती सम्मान, भारत भारती सम्मान, गंगाधर मेहर राष्ट्रीय कविता सम्मान (उड़ीसा) जाशुआ सम्मान(मध्य प्रदेश) व व्यास सम्मान आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
केदारनाथ जी एक कुशल अनुवादक के रूप में भी ख्याति प्राप्त
की, केदार जी ने कभी हार नही मानी उनके अंतर्मन व बाह्य दोनों में जीवन जीने की एक अद्म्य शक्ति थी जिसे वे पहचानते भी थे वे मृत्यु से कभी डरते नही थे, ना ही वे इस दुनिया से अपनों को छोड़ कर जाना चाहते थे शायद तभी तो उन्होंने अपनी अंतिम कविता में लिखा है कि--
जाऊँगा कहाँ
रहूँगा यहीं
किसी किवाड़ पर
हाँथ के निशान की तरह
पड़ा रहूँगा
दबा रहूँगा किसी रजिस्टर में
अपने स्थायी पते के अक्षरों के नीचे
या फिर माँझी के पुल की
कोई कील
जाऊँगा कहाँ.........।
अपनी अन्तिम कविता की इन्हीं लाइनों के साथ भारतीय हिंदी काव्य जगत का यह अनमोल सितारा 85 वर्ष की अवस्था में 19 मार्च 2018 ई०को नई दिल्ली एम्स में इस संसार से अलविदा कह दिया ।
अध्ययन का उद्देश्य--
प्रस्तावित शोध शीर्षक "केदारनाथ सिंह की कविताओं में लोक सौन्दर्य" के अन्तर्गत कवि केदारनाथ जी के सम्पूर्ण काव्य साहित्य को क्रमबद्ध सुव्यवस्थित ढंग से समेटते हुए अपने गहन चिन्तन प्रक्रियाओं के द्वारा हिंदी साहित्य में एक नए अध्याय को जोड़कर केदारनाथ सिंह के काव्य साहित्य को अपने सूक्ष्म अन्वेषण से अप्राप्य नवीन जानकारियों को समायोजित करना ।तथा आधुनिक संदर्भ में केदारनाथ की प्रासंगिकता को सिद्ध करते हुए उनके साहित्य को वैश्विक पटल लाना मेरा मूल उद्देश्य होगा ।
शोध विधि --
प्रस्तुत शोध विषय के अन्वेषण के संदर्भ में मैं केदारनाथ सिंह पर किये गए पूर्ववर्ती कार्यों की समीक्षा करूँगा तथा कवि केदारनाथ के सम्पूर्ण काव्य साहित्य का गहनता पूर्वक अध्यन करते हुए केदारनाथ सिंह से सम्बंधित पुस्तकों,शोधपत्रों, तथा पत्र-पत्रिकाओं के आलेखों का सूक्ष्म निरीक्षण करूँगा तथा विभिन्न सेमिनारों में विद्वानों द्वारा दिये गए वक्तव्यों की समीक्षा करते हुए अपने शोध विषय "केदारनाथ सिंह की कविताओं में लोक सौन्दर्य" को नये स्तर पर पूर्ण करने का सार्थक प्रयास करूंगा ।
अध्ययन का महत्व--
प्रस्तावित शोध शीर्षक "केदारनाथ सिंह की कविताओं में लोक सौन्दर्य" के अन्तर्गत कवि की संपूर्ण पद्य साहित्य का व्यापक अध्ययन करते हुए हिन्दी काव्य साहित्य में एक नए अध्याय की आधारशिला रखूँगा साथ ही मैं विभिन्न विद्वानों के वक्तव्यों व पुस्तकों के अध्ययन के उपरान्त अपने सूक्ष्म तर्कों के द्वारा नवीन तथ्यों से सम्बन्धित सत्य की खोज करूँगा । तथा केदार जी और उनके साहित्य के तत्कालीन परिस्थितियों, सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक, राजनैतिक व उनके वस्तविक लोक को आज के सन्दर्भ में केदारनाथ सिंह जी की प्रासंगिकता को उद्घाटित करूँगा । जिसमे कवि केदारनाथ सिंह जी के काव्य साहित्य की महत्ता बढ़ेगी ।
अध्यन क्षेत्र की सीमा--
प्रस्तुत शोध विषय के अन्तर्गत नयी कविता व उनके पूर्ववर्ती प्रयोगवाद, छायावाद एवं छायावादोत्तर युग का तुलनात्मक  अध्य्यन व उनपर केदारनाथ जी के साहित्य पर पड़ने वाले प्रभावों को रेखांकित करूँगा साथ ही प्रतिष्ठित साहित्यकारों,आलोचकों, समीक्षकों के विचारों का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए नई कविता के अन्य कवियों के काव्य साहित्य का अंशतः विश्लेषण करूँगा साथ ही नवगीत,सठोत्तरी अथवा समकालीन काव्यधाराओं के साथ-साथ आने वाली काव्य धाराओं पर पड़ने वाले प्रभावों को भी रेखांकित करूँगा ।
सन्दर्भित विषय की रूप रेखा---
प्रस्तुत विषय "केदारनाथ सिंह के कविताओं में लोक सौन्दर्य" को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इसे छः अध्यायों में विभक्त किया गया है ।
1- प्रथम अध्याय में केदारनाथ के व्यक्तित्व व रचना संसार के अन्तर्गत कवि का जन्म, माता-पिता, शिक्षा-दीक्षा, बाल्यावस्था आर्थिक व मानसिक संघर्षों तथा उनकी काव्य रचनाओं पर प्रकाश डाला जाएगा ।
2- द्वितीय अध्याय में शोध विषय के अन्तर्गत नयी कविता के साथ-साथ प्रयोगवाद व छाया- छायावादोत्तर युग की साहित्यिक प्रवित्तियों में उनके अंशतः योगदान व नयी कविता के लेखकों , कवियों, व आलोचकों पर अपनी वैचारिक दृष्टि पर पड़ने वाले प्रभावों पर भी अंशतः प्रकाश डालने का प्रयास करूँगा ।
3- तृतीय अध्याय में प्रस्तावित शोध विषय के अनुरूप कवि केदारनाथ सिंह के सम्पूर्ण कविताओं का विस्तृत परिचय दिया जाएगा ।
4- चतुर्थ अध्याय में उनके द्वारा सम्पादित पत्र पत्रिकाओं , शोध आलेखों व अन्य साहित्यिक परिचर्चा के साथ -साथ कवि के मानसिक, सामाजिक, साहित्यिक व स्थानांतरण एवं जीवन संघर्षों को अंशतः समायोजित करूँगा ।
5- पाँचवें अध्याय में "केदारनाथ सिंह की कविताओं में लोक सौन्दर्य" के अन्तर्गत उनकी अर्थवत्ता, गुणवत्ता तथा उनके काव्य में आये बिम्बों, प्रतीकों व लोक सौन्दर्य से सम्बंधित शैलीगत तथ्यों के सार्थकता की विस्तृत व सारगर्भित समीक्षा की जाएगी।
6- उपसंहार-- मैं प्रथम अध्याय से लेकर पंचम अध्याय तक के सभी शीर्षकों का विस्तारगत अपनी बौद्धिक क्षमता व मूल प्रवित्तियों को ध्यान में रखते हुए " केदारनाथ सिंह की कविताओं में लोक सौन्दर्य" को सार्थक एवं सामंजस्यपूर्ण गति प्रदान करूँगा साथ ही लोक के विविध पक्षों की पड़ताल करूँगा और केदार जी के साहित्य में आये हुए महत्वपूर्ण लोक तथ्यों को अपने कठिन परिश्रम व शूक्ष्म अन्वेषण द्वारा साहित्य समाज के समक्ष लाने का सार्थक प्रयास करूँगा जिससे केदारनाथ सिंह जी का नाम व साहित्य वैश्विक पटल पर कई सदियों तक छाया रहेगा ।
सन्दर्भ ग्रंथ सूची--

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