कवि मनकामना शुक्ल 'पथिक' की तीन कविताएँ।
📚मनकामना शुक्ल 'पथिक' की तीन कविताएँ;✍️
'विडंबना'
झिल्लीदार मांशल दीवारों के बीच
झांकती एक नन्हीं सी कली,
अपने नव जीवन के कटु यथार्थ को समझने हेतु!
स्व अधिकारों को पाने हेतु लालायित निश्चल मनःस्थिति से,
करना चाहती है अपने विचारों को प्रेषित
समाज के बीच!
दानवीय कुविचारों को उखाड़ फेंकने को
तत्पर नवस्फूर्ति नव चेतना से भरी
एक जाज्वल्यमान पुंज की भांति!
अपनी जिज्ञासाओं के घरौदे से
बाहर आने को उतावली,
किंतु ! उसकी विह्वलता,निश्छलता व भाव-कोमलता
दबा दी जाती है,
एक नुकीली धार के बीच!
हल्के धक्के में ही सिमट जाती है
अतीत की यादें!
अन्तिम स्वसों के बीच पथरीली आँखों में
सब चूर हो जाता है क्षण भर में!
हाय ? यह विडंबना है!
समाज की ?
छटपटाती है वह नन्ही सी कालिका
झिल्लीदार मांशल दीवारों के बीच!
अनायास ही गूँजती है एक लघु आवाज,
विराट चेतना के रूप में
कोशती है; मानवीय, सामाजिक विडंबना को यथार्थता के इस समृद्द धरातल पर!
मनुष्य की नृशंसता पूर्वक की गयी बर्बरता को,
व्यक्त नही कर पाती अपने विचारों से!
किन्तु! विवश कर देती है
मानव को सोचने हेतु!
इस विडंबना के जर्जर मकानों के बीच !
2- 'गाँव की गरीब बाला'
यौवन की दहलीज पर खड़ी बाला
करती है कल्पनाओं के संसार मे भ्रमण,
बैठी घर के अंदर ही
निहारती आसमा की ओर
कभी बूढ़े मां बाप को तो कभी दीवार में टंगी पुरखों की तश्वीरों को,
संभाल पाना हो जाता है मुश्किल
फिर भी संभल ही जाती है
खुद ब खुद!
रखती है खुद को व्यस्त प्रतिपल घर, आँगन, खेत-खलिहान, फावड़े,कुदालों के साथ, बूढ़े माँ बाप चौका-चूल्हों के बीच ?
शहर में भागती गाड़ियों के पहिये की भांति!
चाह कर भी इज़हार नही कर पाती प्रेम को
अपने अनजाने, अनहोने प्रियतम से,
बुद्बुदाती मन ही मनः पूछ बैठती है,
कल्पना के सुंदर राजकुमार से !
क्या तुम करते हो मुझसे प्यार ?
क्या मैं ! कर सकती हूँ तुम्हारा आलिंगन
पल भर के लिए!
किन्तु! सहसा तिलमिला उठती है
सीने से उठती ज्वर के बीच
प्रिय को न पाकर अपनी बाहों में !
लज्जा से झुक जाता है सिर
मन ही मन शर्माती है बाला!
अपनी किश्मत के आभागेपन पर कोशती है खुद को,
झोपड़ीनुमा खपरैल घर की दहलीज़ पर खड़ी
गरीबी,बेबसी, व लाचारी के मध्य घिरी!
किन्तु याचना नही करती याचक बन कर भगवान से,,,,,
बस करती है प्रतिपाल कर्तव्य,
गहरी आकांक्षाओं के बीच !
सुनहरे पर लगा, अपलक निहारते खुले
आसमां की ओर.........।
3-
'पत्नी सोनम के लिए'
तमाम शिकायतों के बीच भी
तुम्हें रखता हूँ, अपनी स्मृत्तियों में
एक खुली किताब की तरह
वैसे ही जैसे
खुला रखता हूँ छत वाले
कमरे की खिड़कियां अक्सर !
हवा के बनिस्बत
तुम्हारे अंदर भरी पड़ी है जो
मेरे प्रति एक असीम चाहत
जीवाश्म की तरह अपनी आकृतियां लेकर
बार-बार उसी में खो जाने को उतावली!
गहरी झील की तरह, शान्त और निर्बाध
बहते रहने की अदम्य, ईच्छा शक्ति लिए तुम मेरे आंतरिक गहराई में!
तुम्हारे कम बोलने के पीछे भी है एक राज!
जो मुझे बना देता है एक जिद्दी शातिर
मेरा यहीं शातिराना अंदाज
जो तुम्हें बेहद पसंद है
तुम्हारे आंतरिक भावनाओं के ताप पर तपता मेरा यह प्रेम जो
दहकते अदहन में पकते
बासमती के भात की गंध की तरह
आहिस्ता - आहिस्ता उतर जाती है
मेरे जिस्मानी रूह में
किन्तु! कुछ सवाल जो बरबस
छाए रहते हैं, मेरे ज़ेहन में जिसका उत्तर
सिर्फ और सिर्फ तुम हो,
कि तुम ही हो मैं में !
मनकामना शुक्ल 'पथिक'
युवा कवि, आलोचक
(वाराणसी)
mob. No. 9450579550
Email. mkshukla2586@gmail. Com