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सिनॉप्सिस.....📚✍️

"नब्बे के दशक की हिंदी कविताओं में जनपदीय चेतना और उसकी शिल्पगत विशेषताएँ।"

कविता मनुष्य की आदि सहयात्री होने के साथ-साथ मानवीय चेतनशीलता की एक अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति का श्रेष्ठतम जरिया भी है। जिसमे मानव जगत के गहन से गहन पहलुओं तक इसकी व्याप्ति है। इसलिए जीवन की अतल गहराईयों में होने वाले परिवर्तनों की छाया साहित्य में विशेष रूप से कविता पर ही पड़ती है। जिसका परिचय शब्दों - अर्थों, भावों और विचारों के नए संतुलन से मिलता है। कविता ऐसे प्रत्येक संतुलन के साथ हमेशा नयी होती रही है। शायद इसीलिए आचार्य शुक्ल को कहना पड़ा था कि ज्यों-ज्यों मनुष्य पर सभ्यता के आवरण बढ़ते जाएंगे, कविता की जरूरत भी कहीं अधिक महसूस होगी।

इसी तरह स्वातंत्र्योत्तर भारतीय परिवेश में प्रयोग जन्य अतिरिक्त उत्साह से युक्ति लेती ख़ासकर समकालीन हिंदी कविता एक भिन्न दिशा में नये भावबोध, नये मूल्य, रूपगत नये तेवर के साथ सामने आती है। जिसे हम नब्बे के दशक की हिंदी कविता के नाम से अभिहित करते हैं। इस दौर के कवियों ने अपनी रचनाशीलता के माध्यम से न केवल काव्य साहित्य को समृद्ध किया बल्कि उसे एक नई यति व गति भी प्रदान किए हैं।

समकालीनता सिर्फ रचना की अन्तर्वस्तु से जुड़ा सवाल नही है, बल्कि यह रचनाकार के भाषा व शिल्प से भी जुड़ा होता है। कोई भी रचनाकार जितना ही स्वतंत्र व समर्पित होकर समयानुकूल अपनी रचना का सृजन करता है, उसकी रचना उतनी ही प्राणशील व कालजयी होती है।

       हिंदी में कवि को हमेशा विशिष्ट समझा गया है। इस तरह एक कवि को यह पारंपरिक प्रतिष्ठा सदा मिलती रहती है, जो कथाकार, नाटककार, या आलोचक को नही मिल पाती। आज भी सबसे ज्यादे सम्मान, पुरस्कार और विदेश में भ्रमण के अवसर ज्यादेतर कवियों को ही मिलता रहा है।
और यह सच्चाई भी है कि ; समाज मे कविता ही सबसे ज्यादे संकट में घिरी हुई है।
     समकालीन हिंदी कविता में नब्बे का यह दशक अनेक संभावनाओं से लबरेज़ अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाओं के लिए साहित्य में सदैव चर्चा का विषय बना रहेगा। हो भी क्यों न क्योंकि कई बड़ी घटनाएँ इस दशक में घटित हुई हैं। इस दशक में एकसाथ दो से तीन पीढ़ी के कवि वशेष रूप से सक्रिय दिखाई देते हैं।

          इस दौर के कवियों ने हिंदी कविता को एक अलग ही मुकाम दिलाई है। क्योंकि ये कवि जहाँ कहीं एक ओर अपने लोक से जुड़ते हैं, तो वहीं दूसरी ओर किसानों, दलितों, आदिवासियों की पीड़ा को भी रेखांकित करते हैं। इसके साथ ही ये कवि अपने लोक व जनपद से जुड़े रहकर भी एक नए रचना संसार का निर्माण करते हैं।और उनकी कविताओं में उनका जनपद व वहाँ की लोकभाषा तथा जीवन की मिठास सर्वथा विद्यमान रहती है।

इस कड़ी में समकालीन हिंदी कविता के नब्बे की दशक के महत्वपूर्ण कवि ख़ासकर मदन कश्यप, स्वप्निल श्रीवास्तव, नीलय उपाध्याय, बद्रीनारायण, हरीश चंद्र पांडेय, श्रीप्रकाश शुक्ल, एकांत श्रीवास्तव,अनामिका,अष्टभुजा शुक्ल, मणि मोहन, नीलेश रघुवंशी व जीतेन्द्र श्रीवास्तव जैसे महत्वपूर्ण कवियों की सम्पूर्ण कविताओं के विस्तृत फलक पर चर्चा करना चाहेंगे। यह मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण भी रहेगा। किंतु इस चर्चा से पहले हमे जनपदीय चेतना के कुछ बिंदुओं पर भी चर्चा कर लेना ज्यादे उपर्युक्त रहेगा।
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि जनपद शब्द को जहाँ प्राचीन भारत में राज्य व्यवस्था की एक इकाई के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता था परन्तु आजकल खासकर उत्तर प्रदेश में जिले आदि के अर्थ में व्यवहत किया जाता है। वहीं आंधप्रदेश में इसका लोक के व्यापक अर्थों में इस्तेमाल होता है।
हिंदी कविता में 'जनपद' की चर्चा इन सन्दर्भों के अलावा कभी किसी जिले विशेष तो कभी किसी अंचल विशेष से लिया जाता है।

समकालीन हिंदी कविता में इस जनपदीय चेतना को वैशिष्ट्य अभिजात्य चेतना की प्रतिचेतना के रूप में रेखांकित किया जाना प्रासंगिक है।

यह चेतना कहीं से अचानक फुट पड़ी हो ऐसा कतई नही है, बल्कि नयी कविता अथवा उससे भी पहले की कविता के काल से यह एक सूक्ष्म अंतर्धारा के रूप में प्रवाहित होती आयी है। जैसे-जैसे नयी कविता का अभिजात्यवादी तिलस्म हटता है, वैसे-वैसे समकालीन कविता में जनपदीय चेतना की धारा क्रमशः स्पष्ट और प्रखर होती जाती है।

इस तरह स्थानिकता से बँधे रह कर नही  बल्कि उसका अतिक्रमण करके ही श्रेष्ठ कविता संभव होती है।
यदि सही मायने में जनपदीय चेतना की चर्चा की जाए तो यह सोचना पड़ेगा कि क्या उसे जनपद की भौगोलिक सीमा संकीर्ण बनाया जाना चाहिए, अथवा इस शब्द युग्म को किसी विशिष्ट परिभाषिक अर्थ से मंडित करना होगा।

यदि जनपदीय चेतना को किसी भौगोलिक सीमा से आवृत्त किया जायेगा तो निश्चय ही एक भारतीय चेतना के भीतर पचीसों क्षेत्रीय चेतनाएँ या सौकड़ों आंचलिक चेतनाएँ जनपदीय चेतना के नाम पर सिर उठाती दिखाई देंगी।

जनपदीय चेतना का काम्य अर्थ शक्ति व सत्ता के केंद्रों के परे उस भारतीय जन की जागरूकता में निहित है जो महानगरीय बोध के प्रदूषण से अछूता अभी तक अपनी सांस्कृतिक जड़ों से रस ग्रहण करता है।

जनपदीय चेतना की अवधारणा को अभिजात्य चेतना की विरोधी समांतरता में उभरते देखा जा सकता है। यह

अभिजात्य चेतना विशिष्टतावाद का पोषण करती है। इसके विपरीत जनपदीय चेतना कथित भदेस के वरण से भी परहेज नहीं करती।

इस तरह अभिजात्य महानगरीय संस्कार तथा खाँटी जनपदीय संस्कार के संघर्ष की परिणति को लोकसचेतन कविता के शब्द और वस्तु के चयन में ही नही बल्कि उसके शैली शिल्प में भी परिलक्षित किया जा सकता है। उस जनपदीय चेतना को टालने के लिए जिस सहज शिल्प की जरूरत पड़ती है वह बड़बोली अवधारणात्मक तथा गद्य प्रधान कृतिम कविता के शिल्प से भिन्न है।

इस तरह जनपदीय चेतना से संपन्न कविता का आग्रह कविता को पुनः वाचिक बनाने का है।

जनपदीय चेतना में समकालीन कवियों ने लोक जीवन के दैनिक संघर्ष के रूप में आत्मसात किया है।

काव्यभाषा में जनपद की उपस्थिति या जनपदीयता में काव्यभाषा की उपस्थिति आकस्मिक नही हुई बल्कि सुचिंतित है जो यहाँ नगरीयबोध को मुँह चिढ़ाती है।

समकालीन हिंदी कविता में नब्बे का दशक विचाधाराओं का अंत और इतिहास का ध्वंस लेकर आया उस वक्त उत्पादन के साधन बदल गए और बाज़ार का दबदबा बढ़ गया किसानों की आत्महत्याएं बढ़ गयी और हरित क्रांति की पोल खुल गयी, बंजर होती धरती व बढ़ती कृषि कार्य मे लागत के कारण किसान रोजी रोटी की तलास में महानगरों की ओर निकल गए, फिर भी ये कवि अपने लोक से अपने जनपद से सदैव जुड़े रहे।

उनका इस तरह अपने लोक व जनपद से जुड़ाव उनकी रचनात्मकता को उर्वर भूमि ही नही प्रदान करता बल्कि हिंदी कविता को और अधिक समृद्ध भी करता है। जहाँ से समकालीन हिंदी कविता अपने उच्च भाव भूमि पर विराजमान दिखाई देती है। 

         इसका प्रमाण नब्बे के दशक की हिंदी कविताओं में साफ तौर पर देखा भी जा सकता है। इस दौर की कविताओं में कवि ने समकालीन जीवन के जटिल से जटिल यथार्थ की अभिव्यक्ति की है। इन कवियों ने अपनी कविताओं में अपनी माँ, पिता अपने घर-परिवार, पास-पड़ोस और मित्रों-परिचितों के साथ-साथ परिवेशीय वातावरण व पशु-पक्षियों गांव- घर समाज पहाड़, जंगल पठार व वहाँ के लोग उनकी संस्कृति उनके आचार-विचार एवं उनके जीवन संघर्षों आदि का वृहद चित्रण किये हैं।
जनपदीय चेतना प्रकृति के दोहन में नही बल्कि उसके साथ जीने में विश्वास रखती है। जनपदीय चेतना से सम्पन्न कवि प्रकृति और जीवन को अलग-अलग करके न तो देखता है और न अभिव्यक्त करता है। इस तरह सम्बन्धित रचनाकारों की कविताओं में जनपदीय चेतना की अभिव्यक्ति, मानवीय सम्बन्धों और पारिवारिक रिस्तों की खोज इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
5 अक्टूबर 1954 को जन्मे स्वप्निल श्रीवास्तव लोकजीवन से जुड़े कवि हैं। जहाँ उनका जनपद भी विद्यमान रहता है। उनके कविता की कुछ पंक्तियाँ देखें......,
'याद आते हैं'
याद आते हैं धान और जड़हन के खेत/
उनकी बालियों पर मड़राते सुग्गे/पोखर की मछलियों पर बुरी नजर रखने वाले बगुला भगत याद आते हैं/
फसलों के भविष्य पर बात करते हुए
पिता को भूलना कठिन होगा/
माँ याद आती है-जो अक्सर धानी साड़ी
पहनती थी और धान के खेतों की
याद दिलाती थी/याद आते है भाई- बहन जो बारिश होते ही छाता छोड़कर भीगने के लिए निकल जाते थे/याद आता है बचपन का वह दोस्त / जिसे कागज की नाव बनाने में महारत हासिल थी।
××××××
'खपरैल का मकान'
अच्छा था खपरैल का मकान
जहाँ छूट जाती थी कुछ न कुछ जगहें
वहाँ पक्षी बनाते थे घोंसले
सुबह जागने के लिये मुझे अलार्म
लगाने की ज़रूरत नही पड़ती
हम कलरव से जाग जाते थे
पक्का मकान बनने के बाद चीज़ें
बदल गईं
नही बची नीड़ बनाने की जगह
पक्षी बहुत दूर उड़ गए।

  स्वप्निल श्रीवास्तव/ प्रतिनिधि कविताएँ

यहाँ कवि शहर में रहकर भी अपने गाँव मे पहुँच जाता है और वहाँ धान की बालियों पोखरे, मछली मारते व कागज की नाव चलाते बचपन के दोस्त याद आते हैं, याद आती है धानी साड़ी पहने उसकी माँ और खेतों में काम करते पिता व गाँव का खपरैल मकान आदि। इस तरह कवि का समूचे गाँव व जनपद को अपने अंदर समाहित किए हुए उसी में रचा व बसा रहता है।

केवल हिंदी कविता में ही नही बल्कि भारत के सामाजिक, राजनीतिक यहाँ तक कि सम्पूर्ण वैश्विक परिदृश्य में 1990 के काव्य साहित्य की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। जिस वक्त रुष का मॉडल टूटकर विखर रहा था, विश्वभर में वामपंथी व्यवस्थाएं एक-एक कर के ढह रही थी यद्यपि 'व्यवस्था की विफलता विचार की विफलता नही, पर यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नही है कि बेईमान समय मे भी इन कवियों से ईमानदारी की उम्मीद की जाती है।

क्योंकि धूमिल के शब्दों में, 'कविता भाषा मे आदमी होने की तमीज है।'

इस तरह से मुक्तिबोध ने भी सौन्दर्यानुभूति को वास्तविक जीवन की मनुष्यता कहा है। शायद यहीं काऱण है कि कविता को मनुष्यता की मातृभाषा कहा जाता है।
किसी भी कविता में भाषा उसकी प्राण होती है। और भाव उसकी धमनियों में प्रवाहित रक्त

काव्य लोचना में भाषा के विद्यमान पर सेंसर्स कतई सही नही। कविता में यदि कथ्य ही अमूर्त हो और उसके सौंदर्य में जन की जगह अभिजन का पक्ष हो तो इसका पता भी उस कविता की काव्य भाषा से चल जाता है। अगर कोई कवि अपनी भाषा को जनपद की लोकभाषा से नही सींचता,परम्परा से उसे पोषित नही करता, स्थानीयता का चटक रंग नहीं ला पाता, देशज भंगिमा को प्रकट करने में सफल नही हो पाता तथा मध्यवर्गीय कुंठा-लालसा से ग्रसित हो जाता हो, बंद कमरे में किताबी भाषा को जोड़ तोड़ से ही अपना काम चलाता हो तो इसे परीक्षण की कुंजी भी प्रथमतः और अंततोगत्वा कवि की काव्य भाषा ही है। क्योंकि इसकी जड़ें वहीं मौजूद हैं जहाँ लोक धर्मी चिंतक जाना चाहते हैं।

इसी लिए काव्य भाषा को कविता के प्रतिमान का विपर्यक व पाश्चात्य नव्य समीक्षा की फलश्रुति मानना और रूपवादी झुकाव का एक नया आयाम कहकर तिरस्कृत करना कविता की स्वायत्त दुनिया में अवांछनीय दखल जैसा प्रतीत होता है।

वैसे तो नब्बे के दशक की हिंदी कविता की दो से तीन धाराओं के कवि अपनी रचनाधर्मिता के माध्यम से विशेष सक्रिय दिखाई देते हैं। परंतु काव्य की वास्तविक भावभूमि तैयार करने का काम मदन कश्यप स्वप्निल श्रीवास्तव, बद्रीनारायण व श्रीप्रकाश शुक्ल जैसे कवियों ने किया है। इन कवियों की कविताओं ने कविता के स्पेस को भरने का काम किया है। जो कि अन्यत्र नही दिखाई देता। क्योंकि इन कवियों ने अपनी काव्य -भूमि का विस्तार करते हुए भी मूल भूमि को बचाये रखा है। इन कवियों की काव्य भाषा जीवन-यथार्थ की भाषा है उनके जनपद की भाषा है। समकालीन जीवन की जटिलताओं को व्यक्त करने के लिए इससे बेहतर भाषा नही हो सकती। क्योंकि इनके भाषा की लय में जीवन का लय भी समाहित है। काव्यानुभूति एवं जीवनानुभूति के स्तर पर इन कवियों की कविताएँ विविधवर्णी एवं अर्थगर्भी हैं। इन कवियों की कविताओं में लोक व जनपदीय चेतना से जुड़े आंचलिक देशज शब्दों की चमक समकालीन प्रगतिशील धारा के कवि नागार्जुन, त्रिलोचन व केदारनाथ सिंह की भाँति चमकती दिखाई देती है। और यहीं विशेषताएँ इन कवियों को नब्बे के दशक की काव्य परम्परा में विशेष महत्व का अधिकारी भी बनाता है। इन कवियों की कविताओं में लोकभाषा के शब्दों की भरमार है। जो किसी भी कवि की सृजनशीलता को संवर्द्धित एवं संस्कारित करते हैं।

ये कवि अपनी कविताओं के माध्यम से प्रतिरोध की जमीन तो तैयार कर ही रहे थे, साथ ही पूँजी के भूमंडलीकरण, नव उदारवाद और निजीकरण के दौर में अपनी कविता के माध्यम से एक सार्थक हस्तक्षेप भी करते नज़र आते हैं। इसके साथ- साथ इनकी कविताओं में लोक व उनका जनपद तथा अपनी भाषिक कलात्मकता को लिए हुए पूरी शिद्दतके साथ उपस्थित रहता है। 
इसके ताजे उदाहरण के तौर पर कवि श्रीप्रकाश शुक्ल के नए काव्य संग्रह 'क्षीरसागर में नीद' को भी देखा जा सकता है।
एक उम्मीद की तरह खड़ा है अभी भी ललिता घाट/त्रिपुर सुंदरी का साक्षात विग्रह स्वरूप/
नेपाली कारीगरों के हुनर का जीवंत प्रतीक/जहाँ से काशी में कभी उतरता था लालित्य/ जब इसकी सीढ़ियों से गंगा का जल लेकर चढ़ते थे शिव भक्त/नंगे पाँव ही सही भोले दरबार में।
पृष्ठ सं०१०४ 'क्षीरसागर में नींद'

यहाँ कवि पूंजीवाद के विरोध करते हुए आमजन के पक्ष में खड़ा है।  उक्त कविता में मानवीय संवेदना के साथ साथ वहाँ की जनपदीय चेतना व सांस्कृतिक चेतना भी दृष्टिगत होती है जो कवि की विशिष्टता को दर्शाती है।

इसी क्रम में हम मदन कश्यप की कविता 'बड़ी होती बेटी' की पंक्तियां देखते हैं..!

अभी पिछले फागुन में
उसकी आँखों में कोई रंग न था
पिछले सावन में
उसके गीतों में करुणा न थी
अचानक बड़ी हो गई है बेटी
सेमल के पेड़ की तरह
हहा कर बड़ी हो गई है
देखते ही देखते।

जब वह जन्मी थी
तब कितना पानी होता था
कुएँ-तालाब में/नदी तो हरदम लबालब भरी रहती थी
भादों में कैसी झड़ी लगती थी
वैसी ही एक रात में पैदा हुई थी
ऐसी झपासी थी कि एक पल के लिए भी
लड़ी नहीं टूट रही थी/
अब बड़ी हुई बेटी
तब तक सूख चुके हैं सारे तालाब
गहरे तल में चला गया है कुएँ का पानी
नदी हो गई है बेगानी
काँस और सरकंडों के जंगल में
कहीं-कहीं बहती दिखती हैं पतली पतली धाराएँ।

२- बाबा बाबा
मुझे मकई के झौंरे की तरह
मरुए में लटका दो
बाबा बाबा
मुझे लाल चावल की तरह
कोठी में लुका दो
बाबा बाबा
मुझे माई के ढोलने की तरह
कठही संदूक में छुपा दो
मकई के दानों को बचाता है छिलकोइया
चावल को कन और भूसी
ढोलने को बचाता है रेशम का तागा
तुझे कौन बचाएगा मेरी बेटी!

यहाँ कवि को बेटी की चिंता के साथ- साथ सूखते कुएँ, ताल व नदियों की चिंता भी सालती है। जिसमे फागुन का रंग, सावन के गीत व सेमल के पेड़ की यादें व उसकी सुरक्षा का भाव व पीड़ा बोध मिलता है।

समकालीन हिंदी कविता के इतिहास में नब्बे की दशक के कविताओं की अपनी एक अलग ही भूमिका रही है।

कारण ये कि इस दशक के कवियों के कविता की भाषा व उनकी कविताओं में कवि का गाँव और जनपद सर्वथा मौजूद रहा है। साथ ही इनकी ये कविताएँ अपने अंदर जनपदीय चेतना के भावों व शिल्प आदि को लिए हुए, समकालीन चेतनशीलता का व्यापक बोध कराती हैं।

सन 1990-91 में सोवियत रूस का पतन हुवा और वैश्विक स्तर पर नयी परिघटनाएँ सामने आईं। इसका असर हिंदी कवियों की कविताओं पर भी पड़ा। साम्यवादी देश सोवियत रूस के बिखरने के बाद पूरी दुनिया मे वाम-आंदोलन और विचारधारा से जुड़े लेखकों-कवियों के सामने एक तरह की विकल्पहीनता की स्थिति पैदा हुई, कई नए-पुराने कवि के स्वर बदले, सुर बदले इस तरह कल तक जो क्रान्ति की चेतना से लबरेज और प्रतिबद्ध थे, वे सहसा शोकाकुल हो उठे। वे सच्ची निराशा और उदासी की बात करने लगे। ऐसे विभ्रम और संशय व द्विधाग्रस्त माहौल में नब्बे के दशक के इन्हीं कवियों ने अपने को आँचलिक, स्थानीय अथवा जनपदीय भूगोल एवं लोक-संवेदना से संपृक्त किया। यह वहीं लोक जीवन था जहाँ एक ऐसा लोक था। जो सहज और नैसर्गिक था। जिसमे खेती किसानी की बातें थी, ईखों की मिठास व लेवाड लेती भैंसें थी, तो कहीं दंवरी हांकते किसान व खेलते कूदते उनके बच्चे थे। साथ ही वहाँ प्रकृति और मनुष्येतर प्राणियों का सानिध्य भी प्राप्त था। 

कोई भी रचनाकार अपने समय समाज का सजग प्रहरी होता है। और वह उस समय समाज पर अपनी पैनी दृष्टि डाले हुए वह अपने अनुभव के आधार पर युगीन सन्दर्भों व चिंताओं को रूपायित करने का प्रयास भी करता है। तथा रचना की अर्थवत्ता और गुणवत्ता का परीक्षण भी समय समाज की धड़कनों की सफल अभिव्यक्ति के आधार पर करता है। कहीं यह प्रतिमान कला ही बन जाता है। लेकिन कलावादिता रचना कहाँ होती है। रचना तो वह है जिसमे बड़ी ईमानदारी व शिद्द्त के साथ युग स्पंदन सुनाई देता है। और इस तरह के स्वर व उसकी अनुगूंज नब्बे के दशक की हिंदी कविताओं में स्पष्ट तौर पर सुनी जा सकती है।

अब धान गदराने को होगा
इखों में मिठास उतर आया होगा
भैंसें लेवाड़ ले रही होंगी
आलू के खेत कोड़े जा रहे होंगे
कहीं बोझे निबारे जा रहे होंगे
तो कहीं अबेर तक दंवरी हो रही होगी
××          ××            ××
वहाँ पर शरद ऋतु का कहना ही क्या मित्र/कमल खिल रहे होंगे 
अमरूद ढेसरा रहे होंगे/
विजयदशमी का पर्व होगा चहुँ ओर
पत्नी करवाचौथ की तैयारी कर रही होगी।

श्रीप्रकाश शुक्ल  'बोली बात' पृष्ठ सं०23

यहाँ कवि को कृषक व ग्राम्य चेतना से सम्पन्न कवि कहना ज्यादे उपर्युक्त लगता है। क्योंकि कवि की यहीं असली दुनिया है। जहाँ कवि को एक सच्चे भारतीय किसान होने का दर्जा मिलता है। क्योंकि यहाँ पकते अमरूद व धान की बालियाँ हैं, आलू कोड़ते किसान हैं तथा पर्व, त्योहार मनाते अपने लोग हैं। यहाँ कवि अपने समूचे जनपद व ग्रामीण लोकचेतना को लिए उपस्थित रहता है। यहीं नही कवि अपनी लोकभाषा व उसकी मिठास को सदैव बरक़रार रखता है।

इस दौर के कवियों का ध्यान अपने लोक और जनपद की ओर पूरी निष्ठा के साथ गया है। इस तरह वे कवि इस सूखे तल को भी अपने साहित्यिक शब्दों के माध्यम से सिंचन करते हुए उसे निरंतर हरा भरा बनाये रखने का पुरजोर प्रयास किए हैं।

क्योंकि इन कवियों की कविताओं में जीवन के राग और कृषि-संस्कृति और देशज संस्कारों से संपृक्त होने के चलते पाठकों को एक तार में जोड़े हुए उन्हें सुखद एहसास प्रदान करती हैं। इन कवियों ने अपनी जड़ों को बार-बार याद किया है। अपने लोक व अपने जनपद की ओर लौटना एक संकल्प, उम्मीद और स्वप्न की तरह रहा है।

लेकिन आज उमस-भरे इस मौसम में
बादलों की आवाजाही के बीच/
पगुरी करता अपनी ही पीठ के भार से द्रवित अपना यह गाँव/
शहर के ठीक सामने लयनहा बरधा की तरह ताकता रहता है।
पृष्ठ सं.64 'बोली बात'

यहाँ कवि का उम्मीद भरा गाँव व उसके लोकभाषा की गंध मन को एक बार पुनः अपने गाँव, अपने जनपद की ओर लौट चलने के लिए बाध्य कर देती है।

5 अक्टूबर 1965 में जन्मे कवि बद्रीनारायण भी लोक व जनपदीय चेतना से संपन्न कवि हैं।

'मछली'
दुख हुआ जान कर कि
सूख गया मानिकपुर का तालाब/
मानिकपुर के तालाब में एक मछली रहती थी नीली/
जिससे मेरी ख़ूब दोस्ती थी
उसका क्या हुआ
कुछ का कहना है कि
जब धूप में सूख कर उड़ रहा था तालाब का पानी/
तब वह भी सूखती, पटपटाती, भुनती हुई
हवा में उड़ी थी/
जब वह उड़ी थी हवा में तड़पती, ऐंठती, छटपटाती

तो वह कहीं न कहीं तो गई ही होगी
हम तो चले जाते हैं भाग कर
गाजियाबाद, नोएडा, नासिक, सूरीनाम
वह कहाँ गई लोगो ! वह कहाँ गई,
वह भाप बन गई या गिरी जल कर
फिर से किसी तालाब में/
कि उसे किसी धन्ना-सेठ ने पानी के लिए
तरसा कर अपने तालाब में पोस लिया
कि वह गिरी जाकर राष्ट्र की प्रथम महिला
के श्रृंगारदान में
कि वह गिरी किसी तस्कर के वृहद प्लान में
जिसने कि कब्ज़ा कर ली उसकी देह
बेच दिया उसके प्राण को
यह भी हो सकता है कि वह जाकर गिर गई हो
किसी हत्यारे की गहरी नींद के सिरहाने
एक लड़का जो प्रायः उस तालाब के किनारे
घूमता रहता था
उसने कहा- नहीं ! नहीं !
वह जा गिरी थी एक मछुआरे की हथेली पर
जिसने उसे एक लड़की में तब्दील कर दिया
जो आज भी रहती है
प्राणपुर गाँव में
अपने मछुआरे के लिए
किसी और तालाब की
रोहू रीन्हती हुई
उसमें डालने के लिए सरसों का मसाला
पीसती हुई।
हालाँकि बद्रीनारायण की कविताओं में गाँव के साथ-साथ शहरीय चेतना का मिलाजुला असर दिखाई देता है। फिर भी उनका मानिकपुर गाँव उनकी कविता व भाषा में सर्वथा विद्यमान रहता है।

'अपेक्षाएँ'

कई अपेक्षाएँ थीं और कई बातें होनी थीं/
एक रात के गर्भ में सुबह को होना था/
एक औरत के पेट से दुनिया बदलने का भविष्य लिए/
एक बालक को जन्म लेना था/
एक चिड़िया में जगनी थी बड़ी उड़ान की महत्त्वाकांक्षाएँ/

एक पत्थर में न झुकने वाले प्रतिरोध को और बलवती होना था/
नदी के पानी को कुछ और जिद्दी होना था/
खेतों में पकते अनाज को समाज के सबसे अन्तिम आदमी तक
पहुँचाने का सपना देखना था/पर कुछ नहीं हुआ
रात के गर्भ में सुबह के होने का भ्रम हुआ/
औरत के पेट से वैसा बालक पैदा न हुआ
न जन्मी चिड़िया के भीतर वैसी महत्त्वाकांक्षाएँ/
न पत्थर में उस कोटि का प्रतिरोध पनप सका/
नदी के पानी में जिद्द तो कहीं दिखी ही नहीं/
खेत में पकते अनाजों का
बीच में ही टूट गया सपना
अब क्या रह गया अपना।

इस कविता में कवि प्रकृति व मानव समाज की चिंता का भाव दिखाई देता है जो उसे एक सजग कवि होने का दर्जा देती है। 
यहाँ कवि का मानिकपुर गाँव व वहाँ के लोगों के अंदर पलती महत्वाकांक्षाएँ तो है ही साथ ही खेतों में पकते अनाजों को आम आदमी तक पहुंचाने की ललक भी है। किंतु उसे पूर्ण न हो पाने पर उसके अंदर प्रतिरोधी तेवर व छटपटाहट दिखाई देती है। जो कवि को सच्चे लोक व जन नायक कवि होने का दर्जा देती है।

जहाँ तक मुझे लगता है कि कवि बद्रीनारायण व स्वप्निल श्रीवास्तव के कवि व्यक्तित्व में जहाँ स्थिर व शांत का भाव दिखता है, वहीं कवि मदन कश्यप व श्रीप्रकाश शुक्ल की काव्य यात्रा में नवीनता व निरंतरता के साथ-साथ तीखेपन का समावेश भी दिखाई देता है।
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अगर हम निलय उपाध्याय की कविताओं का अध्य्यन करते हैं तो पाते हैं कि कवि अपने गाँव से जाता तो जरूर है पर उसका मन गाँव मे ही पूरी तरह से रचा बसा रहता है। कुछ लेकर जाने के पीछे वहाँ की यादें उनकी स्मृतियों में बनी रहती हैं। कवि अपने गाँव से रोजी रोटी की तलाश में भले ही शहर में चला जाता है पर वह वहाँ रहते हुए भी कवि का मन उसके गाँव मे बरबस ही चला जाता है। यहाँ कवि गाँव से कहता है कि मुझे याद रखना। उसके पीछे वह गाँव की यादों में खुद रमा रहता है। इस प्रकार कवि का जनपद उसकी उसकी कविताओं में ही नही कवि के जेहन में भी सदैव विद्यमान रहता है।
उक्त कविता की निम्न पंक्तियां देखें।
मैं गाँव से जा रहा हूँ

कुछ चीज़ें लेकर जा रहा हूँ
कुछ चीज़ें छोड़कर जा रहा हूँ
मैं गाँव से जा रहा हूँ
किसी सूतक का वस्त्र पहने
पाँच पोर की लग्गी काँख में दबाए
मैं गाँव से जा रहा हूँ
अपना युद्ध हार चुका हूँ मैं
विजेता से पनाह माँगने जा रहा हूँ
मैं गाँव से जा रहा हूँ
खेत चुप हैं
हवा ख़ामोश, धरती से आसमान तक
तना है मौन, मौन के भीतर हाँक लगा रहे हैं
मेरे पुरखे... मेरे पित्तर, उन्हें मिल गई है
मेरी पराजय, मेरे जाने की ख़बर
मुझे याद रखना
मैं गाँव से जा रहा हूँ ।

     निलय उपाध्याय

मध्यप्रदेश के एक शहर भोपाल में जन्मे कवि मणि मोहन एक अच्छे कवि होने के साथ-साथ  एक अच्छे अनुवादक, छायाकार व अंग्रेजी के प्राध्यापक भी हैं उनकी कविताएँ समूचे लोक में रची बसी अपने जनपदीयता व उसकी भाषिक वेशिष्टयता को रेखांकित ही नही करती बल्कि सिद्ध भी करती हैं।

'"'लौटना'
इस बार
कुछ अलग ही था
अपने पिता के घर से
उसका लौटना

पहली बार 
वह लौटी खाली हाथ
सिर्फ स्मृतियों के साथ

पिता की मृत्यू के साथ
जैसे रातों रात बदल गया
उसका भोपाल
स्मृतियों की राजधानी में।

'दोस्त , क़स्बा और भोपाल:' नामक कविता की ये पंक्तियाँ देखिए...
एक और दोस्त ने 
छोड़ दिया क़स्बा
हाँ-ना ...हाँ-ना के बीच 
आखिर ले ही लिया पजेशन
भोपाल के मकान का 

घूमने के लिए 
व्ही आई पी रोड , वोट क्लब या वन विहार
शापिंग के लिए डीबी मॉल
स्कूलिंग के लिए डी पी एस
और कविता के लिए भारत भवन
कितना कुछ मिल गया उसे
इस धूल भरे कस्बे के एवज में

पर यहाँ तो वीरान हो गई
लक्ष्मीनारायण मंदिर वाली गली
एक और मोहल्ला 
वीरान हुआ मेरे लिए
जैसे देखते ही देखते
पेड़ की शाख से
गायब हुआ एक घोंसला

घोंसले से याद आया
यह क़स्बा भी शायद एक घोंसला है
किसी कौए का 
जिसमे एक कोयल
बार - बार
चुपके से रख जाती है 
अपने अंडे ।

इसी तरह 'गंज बासौदा के लिए' लिखी गयी क़स्बा कविता की पंक्तियां दखें.......

इस कस्बे से होकर 
जाने कितनी ट्रेनें गुज़रती हैं
पर दो चार को छोड़कर
सब निकल जाती हैं धड़धड़ाती हुई

प्लेटफार्म पर पैसिंजर ट्रेन का इंतज़ार करते मुसाफ़िर
इनके नामों को लेकर
सिर्फ़ कयास लगाते रह जाते हैं

कहते हैं
इस कस्बे से होकर
औसतन हर पन्द्रह मिनिट में गुज़रती है
एक न एक थ्रू ट्रेन
हाँलाकि इन ट्रेनों से कटकर मरने वालों की
पी.एम. रिपोर्ट में भी नहीं आता8
किसी ट्रेन का नाम

रात के वक़्त 
जब सन्नाटे में डूब जाता है क़स्बा
लगभग अनियंत्रित हो जाती हैं
ये बेनाम रेलगाडियाँ 
आवाज़ की पटरियों पर धड़धड़ाती हुई
ये घुस आती हैं
क़स्बे की तंग गलियों में
हमारे घरों की ख़ामोशी
नींद और सपनों को रौंदते हुए
ये निकल जाती हैं
दिल्ली या मुम्बई की ओर
अपने सफ़र पर ।
 इस प्रकार कवि मणि मोहन एक सजग कवि हैं जो अपने लोक को जनपद को नही भूलते व उसी में रचे बसे भी रहते हैं।

इसी कड़ी में कवि एकांत श्रीवास्तव का नाम बड़ी ही सहजता के साथ जुबां पर आ जाता है।उसका कारण भी है, कि कवि एकांत अपनी एकांतता को अपनों व अपने लोक से तथा अपने जनपद से जोड़े रहते हैं। जहाँ उन्हें नैसर्गिक सुख का बोध होता है। उनकी कविताएं एक अलग ही शिल्प व भावों को लिए पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ती हैं।

8 फरवरी 1964 को जन्मे एकांत श्रीवास्तव समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण चेहरे हैं। 'अन्न हैं मेरे शब्द' (1993) इनका प्रथम काव्य संग्रह है और दूसरा काव्य संग्रह 'मिट्टी से कहूँगा धन्यवाद' के साथ साथ इनके अन्य काव्य संग्रहों को भी अगर हम देखें तो पाते हैं कि कवि अपनी मिट्टी (जड़ों ) से सदैव जुड़े रहना चाहता है। जहाँ पर उसके समूचे जनपद का दृश्य दिखाई देता है।
उनकी कविताओं में एक अलग ही भाव-बोध है जो पाठकों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।

   'नमक बेचने वाले'

ऋतु की आँच में
समुद्र का पानी सुखाकर
नमक के खेतों से
बटोरकर सफ़ेद ढेले
वे आते हैं दूर गाँवों से
शहर की सड़कों पर नमक बेचने वाले

काठ की दो पहियों वाली हाथगाड़ी को
कमर में फँसाकर खींचते हुए
ऐसे समय में
जब लगातार कम होता जा रहा है नमक
हमारे रक्त का
हमारे आँसुओं और पसीने का नमक

वे आते हैं नमक बेचने
चिल्लाते हुए... नमक... नमक
सफेद धोती घुटनों तक मोड़कर पहने हुए
फटी क़मीज़ या बनियान
सिर पर गमछा बाँधे नंगे पाँव
कान में बीड़ियाँ खोंसकर वे आते हैं

और स्त्रियाँ अधीर हो जाती हैं
उनकी आवाज़ सुनकर
वे आती हैं ड्योढ़ियों और झरोखों तक
कि कहीं ख़त्म तो नहीं हो गया
रसोई का नमक
वे बेचते हैं नमक
अपनी आवाज़
और हृदय के शहद को बचाते हुए
वे बेचते हैं नमक

अपने दुख-तकलीफों को
नमक के खेतों में गलाते हुए
वे बेचते हैं नमक
खारे और मीठे के समीकरण को बचाते हुए
एल्यूमिनियम के डिब्बों में
पानी में डूबा भात
सिर्फ़ नमक के साथ खाते हुए
वे बेचते हैं नमक

उनकी आँखें मुँदती जाती हैं
पाँव थकते जाते हैं
बाजू दुखते जाते हैं
आवाज़ डूबती जाती है नींद और थकान की
अंधेरी कंदराओं में
नमक बेचते हुए
यह दुनिया

उन्हें नमक की तरह लगती है
अपने प्रखर खारेपन में
हर मिठास के विरुद्ध
नमक जैसी दुनिया में रहते हुए
बेचते हुए नमक
वे बचाते हैं कि उन्हें बचाना ही है
अपनी आवाज़ और हृदय का शहद।

17 अगस्त 1961 में जन्मी अनामिका हिंदी की चर्चित कवयित्री हैं। आप 'गलत पते कि चिट्ठी'  'कविता अनुष्टुप' 'अब भी वसंत को तुम्हारी जरूरत है' 'दूबधान' जैसे महत्वपूर्ण कविता संग्रहों  की लेखिका हैं। आपको कई सम्मान व पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। अनामिका की कविताओं में गंवई गंध व वहाँ की संस्कृति सदैव विद्यमान रहती है।

'विशाखापत्तनम'

मेरी इन
कोल्हापुरी चप्पलों का
अकडा हुआ
कीचड
एयरपोर्ट के इस
महाचकाचक फर्श पर
वैसे ही टिमक रहा है
जैसे पग्गड
किसान का
दकमता है
कृषि-भवन के
पोस्टर पर।
’परिचारिका‘ में परी
दीर्घइकार भूलकर
हो जाती है
क्यों छोटी इ?

गंज वासौदा, मध्यप्रदेश में जन्मी नीलेश रघुवंशी समकालीन हिंदी कविता में महत्वपूर्ण कवयित्री हैं। अनेक पुरस्कारों से पुरस्कृत नीलेश रघुवंशी 'घर निकासी' 1997 'पानी का स्वाद' 2004 'खिड़की खुलने के बाद' 2017 जैसे कविता संग्रह के लिए जानी व पहचानी जाती हैं। उनकी रचनाओं में उनका लोक व उनका जनपद मजबूती के साथ उपस्थित रहता है। जहाँ उनके अपने लोग व उनकी यादें हैं।

 'कुल्हाड़ी'
चांद के पास तारे
तारों के पास आकाश
धरती के पास पेड़
पेड़ों पर फल-फूल
फल-फूल के पास आधी धरती आधा आकाश
आधी धरती आधे आकाश के बीच कुल्हाड़ी
कुल्हाड़ी के पास कंधा
मुस्कुराता है माली
उसके पास खाद  है किसी और को देने के लिए

घर निकासी कविता संग्रह से......

  

इस संदर्भ में हम यह पाते हैं कि इन कवियों की काव्यभाषा में प्रचलित शब्द-अर्थ व उनकी गुणवत्ता पूरी निष्ठा के साथ विद्यमान रहती है। 
नब्बे के दशक के कवियों का ध्यान वहाँ तक गया जहाँ तक आठवें दशक के कवियों का ध्यान नही जा सका था। ऐसा भी नही कि नब्बे के इन कवियों का रास्ता पूर्ववर्ती कवियों से पूरी तरह से भिन्न था, हाँ यह जरूर है कि इन कवियों के देखने का नजरिया थोड़ा भिन्न था।

सामाजिक विसंगतियाँ, विडम्बनाएँ और नाटकीय एकालाप जैसी विशेषताओं को इन नब्बे के कवियों की कविताएँ अर्थ देती प्रतीत होती हैं। जनपदीयता इन कवियों की एक मात्र विशेषता नही है, बल्कि यह इन कवियों के देखे और भोगे गये जीवन की रागात्मक और संत्रान्स का प्रतिफल है। ये कवि नगरीय जीवन बोध से जुड़े होने के बाद भी अपने ग्रामीण समाज व जीवन-जगत को नही भूलते, बल्कि निरंतर उसी में जीते भी हैं।

इन कवियों की कविताओं में प्रकृति है, पशु-पक्षी हैं, धान, गन्ने व आलू के खेत हैं उनका गाँव व गाँव के लोग हैं, तथा उनका जीवन चरित्र व उनकी भाषा, कला, संस्कृति व सामाजिक सांस्कृतिक रीति व परंपराएं हैं। साथ ही बनते बिगड़ते भूगोल की एक सुंदर झलक भी है।

हिंदी के वरिष्ठ कवि हरीश चंद्र पांडेय हिंदी के बेहद सतर्क एवं चौकन्नी दृष्टि वाले कवि हैं। उनके यहाँ विषयवस्तु- शीर्षक- बिंब- रूपक-प्रतीक का दोहराव न के बराबर मिलता है। भाषा व शिल्प की दृष्टि से भी वे एक लीक पर नही चलते बल्कि वे स्वयं एक नयी राह बनाते हैं। उनके शिल्प में आमजन के बातचीत की आत्मीयता फूटती है। उनकी कविताएँ इन्हीं खास अंदाज़ के कारण पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल रहती हैं। आपकी कविता में जनपद की उपस्थिति विद्यमान है। कुछ पंक्तियां देखें..!

गाय अपने बछड़े को चाट रही है 
रह रह कर चाट डाला है उसने पूरा बदन
कान के भीतर जाती सुरंग को भी दूर तक
कुछ जमा है वहाँ अवांछित 
एक चिड़िया भी रह रह कर चोंच छुआ रही है वहीं
थनों की तरफ हुमक रहा है बछड़ा बार बार
पर मुँह में जाली बँधी है 
मालिक कूटनीति के तहत जाली लगवाये है मर्द बच्चे के मुँह पर
चिड़िया भी अपने स्वार्थ के लिए चोंच मार रही है
पर गाय के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता 
गाय अपने बुढ़ापे के लिए भी नहीं चाट रही।
बुढ़ापे के लिए नहीं।

 हरीश चंद्र पांडेय की कविताओं में चींटियाँ, चिड़िया  टेसू, गुलमोहर, नदियाँ, पोखर, कछार, पहाड़, गाँव देहात व वहाँ के गरीब रिक्से वाले बुजुर्ग व उनके बच्चे यहाँ तक कि वहाँ की प्रकृति, पशु-पक्षी आदि सदैव उपस्थित रहते हैं।
इस तरह जनपदीयता से युक्त अनेकशः नाम आपको उनकी रचनाओं में आसानी से मिल जायेंगे। 
इन कवियों की कविताएं मानवीय जन चेतना से जुड़े रहकर भी मानव मुक्ति के उपायों की तलाश करती दिखाई देती हैं जहाँ से गाँव के मिट्टी की सोंधी गंध का आभास मिलता है।

लोक जीवन की व्यापकता तथा विराट जनपदीय चेतना होने के कारण ये कवि वह स्थान प्राप्त किए हैं, जो अस्सी के दशक के कवियों को नही मिल पाया है। नब्बे के दशक के इन महत्वपूर्ण कवियों के सामने यह भी समस्या थी कि वे क्या लिखें जो आठवें दशक की तरह न हो।  इसलिए उन्होंने अपने मुहावरे, कथ्य, शिल्प में भी बदलाव किया। यह बदलाव ही उन्हें अन्य दशक के कवियों से एकदम भिन्न बना देता है, चाहे वह इनके पूर्ववर्ती कवि हों या परवर्ती कवि हों।

इस प्रकार से इस दौर के कवियों की कविताओं में जनपदीय चेतना की वृहद व उर्वर भावभूमि दूर दूर तक दिखाई देती है। साथ ही साथ लोक की अर्थवत्ता व गुणवत्ता को लिए हुए मानवीय मूल्यों को बचाये रखने की जद्दोजहद भी दिखाई ही देती है।

शायद यहीं कारण भी है कि मंगलेश डबराल ने 1990-91 के हिंदी कविता परिदृश्य पर बात करते हुए उसे 'रिक्त स्थानों की कविता' नाम दिया है।
इन कवियों के सामने साकार के ढ़हने का प्रभाव पहले पड़ता है। निराकार के बचे रहने का संतोष तो बाद में होता है।

कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति बन पड़ी थी जैसी स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्रीय काव्यधारा के कवियों ख़ासकर रामधारी सिंह दिनकर बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' आदि के सामने थी, कि अब क्या लिखें! उन कवियों का काव्य-पतन हो 'हारे को हरि नाम' और कोयल और कवित्त तक जा पहुँचा।
लेकिन 1990 के इन कवियों ने हरिनाम की आध्यात्मिक शरण लेने की बजाय अपने गांव कस्बों को देखना आरंभ किया।
कविता इससे पहले या तो रणभूमि में थी या महानगर केंद्रित थी।
यह ग्राम वासिनी भारत माता की खोज थी। कविता में भारत की खोज डिस्कवरी ऑफ इंडिया भारत जो भारत ही था इण्डिया नही था कविता के संसार मे...!
इस तरह नब्बे के दशक के अधिकतर कवि गाँव कस्बों में रहकर कविता लिख रहे थे। उनकी कविताएँ भारतमाता ग्राम- वासिनी जबकि इसके पूर्व में केदारनाथ सिंह जी का गाँव सत्रह बरस पहले ही छूट चुका था मगर शब्दों में गाँव व जनपद की गंध बची हुई थी।

इस तरह से देखा जाए तो नब्बे के दशक के इन कवियों की काव्यभाषा की जड़ें भले ही परंपरा में गहरी धंसी हों पर उसको खाद पानी लोक व उनके परिवेश से ही मिलता रहा है। परंपरावादी लोकधर्मी आलोचक चिंतक नब्बे के दशक के बाद से काव्यभाषा में निरंतर हुए बड़े बदलाओं को कविता के रूपवादी चिंतन से जोड़कर देखते हैं।

इस तरह हम पाते हैं कि अनामिका, मदन कश्यप, श्रीप्रकाश शुक्ल, स्वप्निल श्रीवास्तव, मणि मोहन बद्रीनारायण, निलय उपाध्याय की कविताओं में  लोक है। जो कभी-कभी शब्दों व लोकोक्तियों के रूप में और कभी-कभी ग्राम्य संस्कृति के प्रति गहरे अनुराग के रूप में प्रतिफलित होती है। जिनके यहाँ लोक तत्व सीधे नहीं था तो स्थानीयता का तत्व बहुत ही आग्रही था। इस तरह इन कवियों का कविता धरातल अपने लोक व जनपदीय चेतना से पगा हुवा है। जहाँ इन कवियों की कविता में आसपास की बहुत ही गहरी डिटेलिंग मिलती है। जो अपनी रचनाधर्मिता की सार्थकता को सिद्ध भी करती है। इस तरह इन कवियों की कविताओं में उनका जनपद व लोक तथा वहाँ की गंवई गंध इन कवियों की कविता का प्राणतत्व है। जो नब्बे के दशक की कविता को एक परिपक्व व उर्वर धरातल प्रदान करता है।

कहना न होगा कि जिस भी कवि का परिवेशीय जीवन के यथार्थ और अंतर्द्वंद्व से पगा हुवा नही, वह अपनी रचना में लोकधर्मी, जनवाद के उस वागर्थ को नही उद्भाषित कर सकता।

इस तरह मेरे शोध में शामिल सम्पूर्ण कवि व कवयित्रियों की रचनाओं में कस्बाई लोक जीवन अभिव्यक्ति व उसकी गंध को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता  है।

 1- शोध विधि --
प्रस्तुत शोध विषय के अन्वेषण के संदर्भ में मैं इन चयनित नब्बे के दशक के निम्न कवियों पर किये गए पूर्ववर्ती कार्यों की समीक्षा करूँगा। तथा इन कवियों के सम्पूर्ण काव्य साहित्य का गहनता पूर्वक अध्यन करते हुए उन कवियों, लेखकों से सम्बंधित पुस्तकों,शोधपत्रों, तथा पत्र-पत्रिकाओं के आलेखों का सूक्ष्म अवलोकन करूँगा। तथा विभिन्न सेमिनारों में विद्वानों द्वारा दिये गए वक्तव्यों की समीक्षा करते हुए अपने शोध विषय "नब्बे के दशक के हिंदी कवियों की कविताओं में जनपदीय चेतना और उनकी शिल्पगत विशेषताएँ" को नये स्तर से पूर्ण करने का सार्थक प्रयास करूंगा ।

2- अध्ययन का उद्देश्य--
प्रस्तावित शोध शीर्षक "नब्बे के दशक की हिंदी कविता में जनपदीय चेतना और उसकी शिल्पगत विशेषताएँ " के अन्तर्गत चयनित निम्नलिखित कवियों के सम्पूर्ण काव्य साहित्य को क्रमबद्ध, सुव्यवस्थित ढंग से समेटते हुए अपने गहन चिन्तन प्रक्रियाओं के द्वारा हिंदी साहित्य में एक नए अध्याय की आधारशिला रखते हुए, इन कवियों के काव्य साहित्य को अपने सूक्ष्म अन्वेषण द्वारा उसमें कुछ अप्राप्य नवीन जानकारियों को भी समायोजित करना।
तथा आधुनिक संदर्भ में नब्बे के दशक के इन कवियों की प्रासङ्गिकता को सिद्ध करते हुए, उनके साहित्य को वैश्विक पटल पर लाना मेरा मूल उद्देश्य होगा।


3 -अध्ययन का महत्व--
प्रस्तावित शोध शीर्षक "नब्बे के दशक की हिंदी कविता में जनपदीय चेतना और उसकी  शिल्पगत विशेषताएँ" के अन्तर्गत चयनित इन समस्त कवि व कवयित्रियों की संपूर्ण पद्य व गद्य साहित्य का व्यापक अध्ययन करते हुए हिन्दी काव्य साहित्य में एक नए अध्याय की आधारशिला रखूँगा। साथ ही मैं विभिन्न विद्वानों के वक्तव्यों व महत्वपूर्ण पुस्तकों के अध्ययन के उपरान्त, अपने सूक्ष्म तर्कों के द्वारा, नवीन तथ्यों से सम्बन्धित सत्य की खोज करूँगा। तथा इन कवियों व उनके साहित्य के तत्कालीन परिस्थितियों, सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक, राजनैतिक व उनके काव्य साहित्य में आए हुए जनपदीय चेतना तथा उनके भाषा व शिल्पगत विशेषताओं को तथा आज के सन्दर्भ में इन कवियों की प्रासङ्गिकता को उद्घाटित करूँगा । जिससे इन कवियों के काव्य साहित्य की महत्ता बढ़ेगी।

4- अध्यन क्षेत्र की सीमा--
प्रस्तुत शोध विषय के अन्तर्गत समकालीन हिंदी कविता ख़ासकर नयी कविता व उनके पूर्ववर्ती प्रयोगवाद, छायावाद एवं छायावादोत्तर युग का भी अंशतः तुलनात्मक अध्य्यन व इन कवियों के साहित्य पर पड़ने वाले प्रभावों को भी रेखांकित करना चाहूँगा। साथ ही प्रतिष्ठित साहित्यकारों,आलोचकों, समीक्षकों के विचारों का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए नब्बे के दशक के पूर्व व बाद के दशकों के अन्य कवियों के काव्य साहित्य का भी विश्लेषण करूँगा। साथ ही नवगीत, अथवा समकालीन काव्यधाराओं के साथ-साथ आने वाली काव्य की अन्य धाराओं पर पड़ने वाले प्रभावों को भी रेखांकित करूँगा।

संदर्भित विषय की रूप रेखा-
प्रस्तुत विषय "नब्बे के दशक की हिंदी कविताओं में जनपदीय चेतना और उसकी  शिल्पगत विशेषताएँ " को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इसे छः अध्यायों में विभक्त किया गया है ।

1- प्रथम अध्याय में इन कवियों के व्यक्तित्व व रचना संसार के अन्तर्गत कवियों का जन्म, माता-पिता, शिक्षा-दीक्षा तथा जनपदीयता को परिभाषित करूँगा। साथ ही उनकी रचनाओं में जनपदीय चेतनशीलता को भी इंगित करूँगा। 

2- द्वितीय अध्याय में शोध विषय के अन्तर्गत नब्बे के दशक की हिंदी कविता के साथ-साथ मूलरूप से पच्चास, साठ, सत्तर व अस्सी के दशक तथा उसके पूर्व के काव्य साहित्य की साहित्यिक प्रवित्तियों तथा उनके अंशतः योगदान व नवगीत तथा नयी कविता के लेखकों , कवियों, व आलोचकों पर इन कवियों के वैचारिक दृष्टि पर पड़ने वाले प्रभावों पर भी उद्घाटित करूँगा।

3- तृतीय अध्याय में प्रस्तावित शोध विषय के अनुरूप चयनित इन समस्त कवियों के सम्पूर्ण कविताओं व उनके संग्रहों आदि का विस्तृत परिचय दिया जाएगा।

4- चतुर्थ अध्याय में उनके द्वारा सम्पादित पत्र पत्रिकाओं , शोध आलेखों व अन्य साहित्यिक परिचर्चा के साथ -साथ कवि के मानसिक, सामाजिक, साहित्यिक व स्थानांतरण एवं जीवन संघर्षों तथा साहित्यिक योगदान आदि को भी अंशतः समायोजित करते हुए, इन कवियों का कालक्रम के अनुसार मूल्यांकन भी करूँगा।

5- पाँचवें अध्याय में " नब्बे के दशक की हिंदी कविता में जनपदीय चेतना और उसकी शिल्पगत विशेषताएँ" के अन्तर्गत उनकी अर्थवत्ता, गुणवत्ता तथा उनके काव्य में आये बिम्बों, प्रतीकों तथा  'भाषाई एवं शिल्पगत परिवर्तनों' को लक्षित करते हुए इस पर विस्तृत व सारगर्भित टिप्पणी की जाएगी।

6- उपसंहार-- मैं प्रथम अध्याय से लेकर पंचम अध्याय तक के सभी शीर्षकों का विस्तारगत अपनी बौद्धिक क्षमता व मूल प्रवित्तियों को ध्यान में रखते हुए " नब्बे के दशक की हिंदी कविता में जनपदीय चेतना और उसकी  शिल्पगत विशेषताएँ" को सार्थक एवं सामंजस्यपूर्ण गति प्रदान करूँगा। साथ ही जनपदीयता के विविध पक्षों लोक जीवन परम्पराएँ, रीति, रिवाज, रहन- सहन खान- पान वहाँ के लोगों की प्रवित्ति व प्रकृति तथा उनकी रचना में आये साहित्यिक बदलावों की पड़ताल करूँगा, और उक्त कवियों के साहित्य में आये  जनपदीयता से सम्बंधित महत्त्वपूर्ण तथ्यों को अपने कठिन परिश्रम व शूक्ष्म अन्वेषण द्वारा साहित्य समाज के समक्ष लाने का सार्थक प्रयास करूँगा। जिससे नब्बे के दशक की हिंदी कविता की महत्ता बढ़ेगी। जिससे इस समकालीन हिंदी कविता का यह दशक साहित्य के वैश्विक पटल पर कई सदियों तक छाया रहेगा ।
सन्दर्भ ग्रंथ सूची ;
1- सोधादर्श, समकालीन कविता की जनपदीय चेतना, प्रो० ऋषभदेव
link w.w.w shodhadarsh 11/2019
2-वागर्थ का 209वाँ अंक दिसम्बर 2012 पृष्ठ संख्या 53
3-वागर्थ का 211 वाँ अंक फरवरी 2013 पृष्ठ सं० 40
4-क्षीरसागर में नींद, कविता संग्रह, कवि श्रीप्रकाश शुक्ल। सेतु प्रकाशन दिल्ली 110092 प्रकाशन वर्ष 2019 पृष्ठ सं० 104
5-बोली बात कविता संग्रह, श्रीप्रकाश शुक्ल, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली 110002 प्रकाशन वर्ष 2007 पृष्ठ सं० 23, 64
6-नीम रोशनी में मदन कश्यप, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा। प्रकाशन वर्ष 2000
7- 'सच सुने कई दिन हुए' बद्रीनारायण, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राईवेट लिमिटेड 2/38 
अंसारी मार्ग दरियागंज, नई दिल्ली।110002 प्रकाशन वर्ष 1993
8- 'ईश्वर एक लाठी है' कवि स्वप्निल श्रीवास्तव। नवलेखन प्रकाशन हजारीबाग। प्रकाशन वर्ष 1982
9- "साठोत्तरी हिन्दी कविता में लोक सौन्दर्य"  श्रीप्रकाश शुक्ल लोकभारती प्रकाशन 15-ए, महात्मा गांधी 

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