पुस्तक समीक्षा!📚
'हजारीप्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य' हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि, आलोचक श्रीप्रकाश शुक्ल द्वारा संपादित आलोचनात्म पुस्तक है।
समकालीन हिंदी साहित्य जगत में खासकर काविता व आलोचना के क्षेत्र में श्रीप्रकाश शुक्ल अपनी स्पष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं।
वे एक साथ काविता,यात्रासंस्मरण व आलोचना पर लगातार लिख व दिख भी रहे हैं।
उनकी आलोचकीयता अपने समय-समाज की सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक तथा मनुष्य की भौतिकता के साथ-साथ अनेक ज्वलंत मुद्दों से टकराती हुई हमेशा नए विकल्पों की तलाश तो करती ही है, साथ ही पाठकों से सवाल भी करती है। मानवीय पीड़ा, संवेदना भी उनके लेखन में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है।
इस तरह लोक से लोकोत्तर की ओर उन्मुख मानवीय सामाजिक चिंता उनके साहित्य का अहम हिस्सा रहा है। श्रीप्रकाश को कोरोजीवी काविता का सिद्धांतकार भी माना जाता है।
इस वैश्विक संकट की घड़ी में आप समय का सदुपयोग करते हुए कई महत्त्वपूर्ण कोरोजीवी कविताओं के सृजन के साथ अनेक कालजयी रचनाकारों के समय संदर्भों व उनके जीवन प्रसङ्गों तथा आजके समय में उनकी प्रासंगिकता को लेकर कई महत्त्वपूर्ण व्याख्यान भी देते रहे हैं। उनकी आलोचकीयता में साहित्य तथा समाज के स्वरूप को निर्धारण करने की कलात्मक पौढ़ता विद्यमान रहती है।
श्रीप्रकाश अपने इस साहित्यिक ताने-बाने के भीतर पनपते छल-छद्म को पहचानने व उसे व्यक्त करने में माहिर आलोचक हैं। वे विलुप्त होती मनुष्यता के दस्तावेजों का संधान करते हुए रचना के भीतर प्रवाहित हो रहे प्राण तत्त्व से पाठकों का साक्षात्कार करवाते हैं।
प्रस्तुत समीक्ष्य पुस्तक के अपने आरंभिक लम्बे आत्म वक्तव्य में श्रीप्रकाश ने 'अविच्छिन्नता की अवधारणा' 'आधुनिक मन' 'परंपरा बोध, संस्कृति व सामासिकता: 'संघर्ष और सौंदर्य' 'मिलन की आकांक्षा' शुक्ल व द्विवेदी संदर्भ- 'आचार्य द्विवेदी व हिंदी विभाग' व साहित्य की व्याख्या जैसे अपने कई उप-शीर्षकों के माध्यम से आचार्य द्विवेदीजी को एक जागतिक आचार्य के रूप में स्थापित करने की पुरजोर वकालत करते हैं। इसके साथ ही उनके लालित्य बोध की संघर्षमूलक पीड़ा, संवेदना खासकर बनारस के काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अपनी स्थापनाओं से लेकर 1960 में बीएचयू के हिंदी विभाग से उन्हें निकाले जाने के साथ उनके आत्म संघर्षों एवं संभावनाओं व उनसे जुड़े तमाम सन्दर्भों को भी तथ्यपरक ढंग से उद्घाटित करने का शाश्वत प्रयास भी किए हैं। यहाँ श्रीप्रकाश शुक्ल के गहन आलोचनात्मक विवेक का परिचय मिलता है।
लेखक के आत्म वक्तव्य में द्विवेदीजी के बनारस विस्थापन की पीड़ा व संघर्षों को आसानी से समझा जा सकता है। यह पुस्तक द्विवेदी जी के सांसारिक व वैश्विक दोनों रूपों को समझने में भी हमारी मदद करती है। जो उनके भौतिक चिंतन पर लिखी गयी अबतक की महत्त्वपूर्ण संपादकीय आलोचनात्मक पुस्तक है। जिसके द्वारा द्विवेदी जी के अकाट्य ज्ञान व कौशल का भी पता चलता है।
इस प्रकार श्रीप्रकाश ने द्विवेदी जी से जुड़े गंभीर से गंभीर मुद्दों को बड़ी ही सहजता के साथ अति प्रभावी व रोचक ढंग से भाषा में प्राण फूंकते हुए पाठक वर्ग के सामने रखते हैं, जिससे पुस्तक की उपादेयता और अधिक बढ़ जाती है। यह पुस्तक ऐसे समय मे पाठकों के बीच आयी है जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय अपनी शताब्दी वर्ष मना रहा होता है, जहाँ से आचार्य द्विवेदी जी का गहरा सम्बंध रहा है।
पुस्तक में लेखक द्वारा द्विवेदी जी के सम्पूर्ण 'जागृत' में 'जगत' और सम्पूर्ण 'जगत' में जागृत होने के प्रमाण को भी सिद्ध करने का सफल प्रयास किया गया है।
अनेक महत्त्वपूर्ण कालजयी रचनाकारों को समेटती यह पुस्तक आचार्य द्विवेदी जी के पारस्परिक संबंधों की पड़ताल भी करती है। इसके साथ ही इसमे बनारस जैसे शहर खासकर बीएचयू हिंदी विभाग में द्विवेदी जी के छले जाने का रोचक वर्णन भी मिलता है। जिसे लालित्य के बरअक़्श छालित्य की मौलिक व्याख्या के रूप में देखा जा सकता है।
इस तरह यह पुस्तक द्विवेदी जी के जागतिक पक्ष को तो रेखांकित करती ही है, इसके साथ ही उनके लालित्य बोध की संघर्षमूलक व्याख्या भी प्रस्तुत करती है। जिसमे द्विवेदी जी के संघर्षमूलक क्रमिक विकास के अनेकशः पक्षों का सत्यतः रहस्योद्घाटन किया गया है।
यह पुस्तक द्विवेदीजी के बहुआयामी पक्षों का उद्घाटन ही नहीं करती बल्कि उनसे जुड़े अनेक गुप्त रहस्यों को परत दर परत खोलती भी है, साथ ही उनकी सृजनशीलता के विविध पक्षों को अनेक छोटे व बड़े लेखकों के माध्यम से रखते हुए वर्तमान समय मे द्विवेदीजी की प्रासंगिकता को सिद्ध भी करती है।
श्री शुक्ल द्वारा संपादित इस आलोचनात्मक पुस्तक की परिधि काफी विस्तृत है। लगभग 429 पृष्ठों से सुसज्जित इस पुस्तक में विश्वनाथ त्रिपाठी, शिव कुमार मिश्र, शंभुनाथ, खगेंद्र ठाकुर, अल्पना मिश्र, नित्यानंद तिवारी, बच्चन सिंह, ,रामाज्ञा शशिधर, मनोज सिंह, वीरेंद्र मोहन, ए. अरविंदाक्षन, अनुभव दास, अरुणेश नीरन व रविशंकर उपाध्याय जैसे लगभग तीन पीढ़ी के 28 रचनाकारों के विभिन्न आलेख शामिल हैं।
शुक्ल जी इन लेखकों के माध्यम से द्विवेदी जी के कृतियों व अलग-अलग वैशिष्टयताओं तथा उनके तमाम जीवन संदर्भों को उद्घाटित करते हुए विभिन्न महत्त्वपूर्ण लेख इस पुस्तक में शामिल किए हैं। इस तरह द्विवेदीजी का सम्पूर्ण लेखन ही जागतिक हो उठा है। जो आलोचना की समृद्धि दृष्टि का परिचायक है।
साहित्य जगत में जब शुद्ध आलोचना कर्म व उसकी कमी को लेकर अनेक सोशल साईटों व पाठकों में रोना रोया जा रहा हो, तो ऐसे समय मे यह पुस्तक उम्मीद ही नहीं जगाती बल्कि आलोचना कर्म को और अधिक मजबूत आधार प्रदान करती है।
इस पुस्तक के संदर्भ में हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि, चिंतक मदन कश्यप अपने एक आत्म वक्तव्य में कहते हैं कि अगर मस्तिष्क के साथ रीढ़ और ज्ञान के साथ साहस की बात भारतीय परंपरा में कभी उठेगी तो आचार्य द्विवेदी जी की बहुत याद आयेगी।
इस तरह यह पुस्तक आलोचना कर्म व द्विवेदी जी के जीवन प्रसङ्गों को समझने में मील का पत्थर साबित होगी। तथा साहित्य के विद्यार्थियों व द्विवेदी जी पर अनुसंधान कर रहे शोधार्थियों व साहित्य के तमाम सुधी अध्येताओं के बीच इसकी उपादेयता बढ़ेगी।
पुस्तक : हजारीप्रसाद द्विवेदी एक जागतिक आचार्य
संपादक : श्रीप्रकाश शुक्ल
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन
मूल्य 410 ₹