पथिक की कविताएँ।


१- 'उम्मीद'

मैं दुःखों को झेल लेता हूँ
इन उम्मीदों के साथ
कि किसी के सुख का भी हिस्सा बन सकूँगा एक दिन

और सुखों में भी जी लेता हूँ दुःख के कुछ पल स्मृत्तियों के सहारे
ताकि अथाह दुःख की घड़ी में भी
बचा सकूँ खुद को टूटने से

सुख दुःख के इस जीवन क्रम में
एक उम्मीद ही है
जिसके सहारे जी रहा हूँ
समर शेष इस नश्वर संसार में !

      मनकामना शुक्ल 'पथिक'
           29/05/2021

२- 'नियति के डंडे'

उद्योग व शहरीकरण के अंधी दौड़ में शामिल, मानव के इस विकासयात्रा पर प्रश्नचिह्न लगाती
समूची पृथ्वी कोष रही है मानवीय कृत्यों को महाप्रलय के इस युग में

खुद के साथ होते इस बर्बर, असहनीय कृत्य से छुब्ध
प्रकृति भी बहा रही है आंसू
स्वार्थी होते इंसानों की नीयत पर
निहारते अपनी जर्जर काया

जब नियति के डंडे पड़ेंगे
एक दिन उसके नग्न देह पर
तब छा जायेंगे मानव के अस्तित्व पर संकटों के बादल ज्वालामुखी, तूफानों, अतिवृष्टि, अनावृष्टि के रूप में

फिर आत्मग्लानि में पश्चाताप करते
रोयेंगी इंसानों की आत्माएं एक दिन धरती पर
तब दुनिया में सब कुछ होगा
हवा, मिट्टी, पानी, पहाड़, नदियां, झरने, पेड़ व समूची हरी भरी पृथ्वी सिवाय इंसानों के..!

( मनकामना शुक्ल 'पथिक' )
      ०५/०६/२०२१

३ - 'सहारा दिला दे मुझे'

धूप तो धूप है, आग जलती बहुत
बिन तपाए मैं सोना न बन पाऊंगा,
नाव प्रभु छिछले जल में न चल पायेगी
सागर तेरे बिना मैं न तर पाऊंगा,,

बिन तुम्हारे कृपा राह मिलती नहीं
निज कृपा वो अनोखी दिला दे मुझे,
भय न किंचित रहे इस धरा पर हमें
राह बढ़ जाऊं निर्भय बना दे मुझे,,

खूबसूरत उजाले सी दुनिया है ये
कहीं अंधेरे में फंसने न देना मुझे,
मैं तो हूँ शिष्य साधक तुम्हारा प्रभु
बे सहारा, सहारा दिला दो मुझे,,

तूँ तो भगवान है कुछ कमी ना तुझे
सेवा,सद्ज्ञान,आध्यात्मता दे मुझे,
हो सके यदि न ऐसा हे प्रभु आपसे
तो काशी का कंकड़ बना दे मुझे,,

तूँ तो भगवान है कुछ कमी ना तुझे,
बेसहारा हूँ सहारा दिला दे मुझे,,

(मनकामना शुक्ल 'पथिक')

४- 'बदल गए'

आफ़त गले पड़ी कि हर नज़र बदल गए
वक्त के दरम्यान  सारे शहर  बदल  गए

दिन भर रही अंगड़ाईयों में झांकती नजर
पर रात की करवट में ए ज़िगर बदल गए

ओ मौसमी ख़ुमारी वादियों में थी इस कदर
सूरज को उगते देखकर पत्ते बदल गए

लौटा जब 'पथिक' दूर से अपने शहर की ओर
पाया कि सारी खिड़कियाँ ओ दर बदल गए

आफत गले पड़ी कि हर नज़र बदल गए
वक्त के दरम्यान सारे  शहर बदल  गए 
गज़ल         
आफ़त गले पड़ी यूँ हर नज़र बदल गए ,
वक़्त के दरम्यान सारे शहर बदल गए ।
दिन भर रही अंगडाइयों में झांकती नज़र,
पर रात की करवट में ऐ ज़िगर बदल गए ।
आफ़त गले........................।
लम्हे व ज़िस्म में छिपे  थे ख़्वाब जो  मेरे,
उन ख़्वाबों के खातिर सारे तेवर बदल गए ।
उड़ता रहा परिंदों की तरह आसमाँ में यूँ,
पर नींद से उठा तो पाया पर बदल गए ।
आफ़त गले पड़ी...................।

ऐ मौसमी ख़ुमारि वादियों में थी इस कदर,
सूरज को उगते देखकर पत्ते बदल गए ।
पतझड़ को आते देख जो भँवरे उदास थे,
बसन्त ऋतु के आते हि मंज़र बदल गए ।
आफ़त गले..........................।

लौटा "पथिक" जब दूर से अपने शहर की ओर,
पाया कि सारी खिड़कियाँ व दर बदल गए ।
आफ़त गले पड़ी कि हर नज़र बदल गए ,
वक़्त के  दरम्यान सरे   शहर बदल गए      रचनाकार~~~~मनकामना शुक्ल "पथिक"
                                      
मनकामना शुक्ल 'पथिक'
02/06/2021

५ - 'तुलसी मेरे आँगन की'

खपरैल घर के आंगन की देहली के ठीक नीचे बने गड्ढानुमा गमले में
एक नन्हा सा पौधा
हवा के लघु झोकों के साथ
अपनी शाखाओं को हिलाता
मानो कुछ कह रहा हो मुझसे !

मैं उसे निहारता अपलक
बतियाता रहा मन ही मन
और खो गया अपने
बालेपन के अतीत में
जहाँ पर होने लगा बोध
खुद के बच्चा होने का
जब माँ का स्पर्श पाने के लिए
रहता था उत्कंठित

पुजा के बाद हर रोज बाबूजी, माँ और दादी माँ भी डाल देती थी
एक लोटे जल,
प्रसन्न हो झूम उठती थी तुलसी
मेरे आँगन की !

जलाती थी दादी माँ एक दिया
शाम के वक्त
करते थे बाबा हरेक दिन
मानस का पाठ पुजा के वक्त
इठलाती, झूमती तुलसी मानो
दुहरा रही हो मानस की उन चौपाइयों को
और कर रही हो प्रसन्नता का इज़हार

मैं हर रोज निहारता रहा अपलक
समय के साथ गुजरते गए वक्त
पर शिलशिला थमा नहीं
पुजा, दीप, आरती का...
इन्हीं सांस्कृतिक परंपराओं के बीच
मैं कब बड़ा हो गया
यह बोध ही नहीं रहा
उसी तुलसी की भाँति

एक दिन ऐसा समय आया
जब सदाबहार रहने वाली तुलसी
सूख चुकी थी मेरे आँगन में,
दादी माँ के कहने पर
उखाड़ दिया उसे बाबूजी ने
क्षमा माँगते अपने काँपते हाँथों से !

कर दी जाती है प्रवाहित
गाँव के तालाब में गंगाजल के साथ
यह देख मैं निहारता रहा
कभी विसर्जन तो कभी
तुलसी माँ के उस गमले को
और पूछ बैठा
दुःखद स्वरों में दादी माँ से
क्यों हटवा दी तुनें तुलसी माँ को
मेरे आँगन से.?

समझाती रही दादी माँ मुझे
गीता के अट्ठारह अध्यायों के सत्य को
कृष्ण के उपदेशों की भाँति
मैं सुनता रहा उसके सत्योपदेशों को
अपनी जिज्ञासाओं को शांत करते
जाना होगा सबको एक दिन
अपनी स्मृत्तियों को छोड़कर
इस नश्वर जगत से !

तुलसी भी छोड़ गयी है
अपना अस्तित्व
इन छोटे पौधों के रूप में!
मैं फूट पड़ा करते स्पर्श तुलसी के
नन्हें पौधों को

पहले की भाँति हर रोज
होता रहा उसका जलाभिषेक, आरती
मैं डबडबाई आँखों से अतीत में खोया
कब सो गया पता ही नहीं चला!

पक्षियों की चहचहाहटों से
खुली मेरी तंद्रा
भागा आया गमले के पास उसी वक्त
मलते अपनी आँखों को
पाया कि उसी गमले में
एक नन्हा सा पौधा
झूम रहा था मुस्कुराता
मानो कह रहा हो
यहीं है जीवन का शास्वत क्रम
मनुष्य के अस्तित्व का

मैं प्रसन्न हो चूम लिया
उसके नन्हें, कोमल पत्तों को
अपने होठों से
फिर खिल उठी मेरा स्पर्श पाकर
तुलसी मेरे आँगन की !

मनकामना शुक्ल 'पथिक'

६ - 'अब नहीं रहा है गांव जैसा गांव'

अब नहीं रहा है गाँव जैसा गाँव
अब नहीं हैं आम,पीपल, नीम के वे छाँव
आती है याद अपने बचपन के गाँव की
जहाँ पर पेड़ों की छाँव में
खेला करता था आँख मिचौनी का खेल

जहाँ पर बूढ़े, बच्चे नर-नारी
पशु-पक्षी बगिया व क्यारी
सबके चेहरों पर झलकती थी
एक प्यारी सी मुस्कान

तब उतना न तो था विकास
बिजली- बत्ती साधन सड़कें
ईंटों वाला मकान
ना ही था उतना सौंदर्य का सामान

बस वहीं चार आने की माचिस
ढिबरी का तेल
छप्पर से ढका हुवा मिट्टी का मकान

अंधेरे कोने में घिघियाता चूल्हा
जिसका धुवाँ दिखता था सुबह शाम अक्सर छप्पर के उपर आसमान तक

वह भी एक समय था जब
सबमें था अपनापन और भाई चारा
एक दूसरे के सहयोग का आनंद
जड़ी बूटियों का जमाना

गाँव के कुछ दूर पश्चिम बहती थी
एक नदी अविरल गति सी
जो थी पहचान गाँव के जल संस्कृति की

आगे पड़ता था पुल जहाँ
वर्षात के मौसम में खेलते थे तैराकी
घंटों, पहरों, रोज..!
पड़ती थी घर पर डॉट
नहीं मिलता था उस दिन हमें भोजन
पर चुपके से छिप कर
चट कर जाता था रखा भोजन

फिर आती है उस बचपन के गांव की
जब आता था अषाढ़ का दिन
खेतों में पड़ते थे बीज
होता था रोपनी का कार्य

याद आता है फुदकती गौरैयों को पकड़ना
गिल्ली-डंडे का खेल
बचवा बचिया के साथ बिताए पल
मिट्टी के कोठों पर लुकाछिपी की यादें
यह सोच सिसकता यह निर्मल मन
कि अब नहीं मिलेगा ओ बचपन
अनायास ही नम हो जाती हैं आँखें
पुरानी यादों में!

जब बिताते थे खेतों में दिन भर का पहर
बाबूजी व बाबा के साथ
कुछ दर्द बाँटते थे खेतों में फावड़े, हल व कुदालों के बीच चिलचिलाती धूप में श्रम कार्य करते!

याद आता है बाबा-दादी, भईया दीदी
बाबूजी और माँ का दुलार
बचपन के साथी व पड़ोसी
खेत, खलिहान, आँगन व घर द्वार

मैं जब भी होता हूँ अतीत की यादों में
पुलकित हो उठता है अंतर्मन
उस बालेपन की समृत्तियों में
विवश हो उठता हूँ
उन यादों को संजोने को किंतु उलझ जाता हूँ मोह व माया के जाल में
अनेक शब्दों के बीच!

फिर आ रही है याद घर और गाँव की
आम, जामुन नीम के उस छाँव की
लोगों के एकतापन व भाईचारे की
गिरते को लाठी के सहारे की

पर अब नहीं रहा है गाँव जैसा गाँव
न ही है वहाँ पेड़ों की छाँव
बुझ गयी है गाँव की जलती ओ बाती
जब बाल सुख अनुभूतियाँ सब थी हँसाती

जहाँ सीमित साधनों में थी भरी सम्पन्नता
अब नाना साधनों में भी जहाँ पर दर्द है
मिट रही संयुक्त परिवार की परंपरा
अब एकाकीपन में भी जहाँ पर दर्द है

खो गया अतीत का अरमान
खो गया अब बडों का सम्मान
बुझ रही है अहिंसा व सत्य की चिंगारियां
खो गया बचपन यहीं अब दर्द है।

'पथिक'

'
(2009 में पड़े सूखे पर एक गरीब किसान की पीड़ा पर लिखी गीत।)

७ - :सुखेला नयनवाँ

कईसे के जिहं माई तोर ई ललनवाँ
सूखि जाले धरती सगरौ सुखेला नयनवाँ
              कईसे के जिहं माई.......।

सुबहा के घाम लागे जेठ के दुपहरी
कउनो नखतवा देखालै नाहीं बदरी
तपते त बीत गईल ई अषाढ़, सवनवाँ
              कईसे के जिहं माई........।

झुरा अकाल साल सालै परि जाला
चईति अगहनी के बीज जरि जाला
छोड़ि गाँव चिरई,चुनमुन उड़ि गइलन बनवाँ
               कईसे के जिहं माई.......।

कईसे के होई आगे पूतन के पढ़ाई
कईसे करब माई बेटी के  विदाई
कईदा तूँ माई मोर पूरा ई सपनवाँ
               कईसे के जिहं माई........।

बुधिया बीमार बनलि कपरा के बोझा
डॉक्टर दवाई बोलई भूत सोखा ओझा
कईली दवाई बेचि जेवरा  बसनवाँ
               कईसे के जिहं माई.......।

तोहके श्रृंगार माई अब का पहिराईब
माला,फूल,मेवा,खीर कहाँ ले चढाईब
चढ़ल बाटे दाम सगरौ ऊँचे असमनवाँ

कईसे के जिहं माई तोर ई ललनवाँ
सूखि जाले धरती सगरौ सुखेला नयनवाँ

मनकामना शुक्ल 'पथिक'

८ - 'भाषा की तहों में'

करता हूँ प्रवेश
मैं भाषा की तहों में
आहिस्ता-आहिस्ता
जैसे करती हैं प्रवेश हवाएं समूचे
वातावरण में, और नदियाँ समंदर में
फिर अपने सही अर्थों को पा
खिल उठता है मेरा चेहरा
जैसे एक बच्चा अपनी माँ से मिल कर
मस्त हो खिलखिला उठता है खुशी से

मिलती है अपनी जड़ों को
फौलादी ताक़तें सौ गुनी
उस भाषा के स्पर्श से
और मैं फैलता जाता हूँ
उस बटवृक्ष के अनेक झुकी हुई
शाखाओं की भाँति!
जो जड़ व चेतन के रूप में
जुड़ी होती हैं परस्पर
हमारी चेतनाओं से

जिसकी जड़ें धंसी होती हैं
अपनी अंतश्चेतना की
अतल गहराईयों तक
जहाँ से मिलती है हजार गुना ताकतें
जो बनाती है हमें मज़बूत तमाम मजबूरियों के खिलाफ!
मैं पूरी ताकत से भाषा को
उछाल देता हूँ अपनी मजबूत
जड़ों के बल उर्ध्वगामी धरातल पर

पृथ्वी की मोटी परतों को धकेलते
उग आता हूँ प्रस्थरों पर भी
कुटज की भाँति
अपनी बाहों को फैलाए
और व्यक्त करता हूँ
युग-युग की संभावनाओं को
अपनी भाषा व भावों के बल पर
मुस्कुराते, निहारते
क्षितिज के उस पार तक

और जीता हूँ अपनी ज़िंदगी के
बचे हिस्सों को
एक फौलादी ताक़तों की तरह
अपने ही भाषा के भीतर गतिशील हो
जिसका फ़ैलाव एक दूसरी भाषा में भी घुलमिल जाता है हवाओं के सदृश..!

मनकामना शुक्ल 'पथिक'
01/06/2021



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