'पथिक' की तीन कविताएँ।


१-  'विडंबना'

झिल्लीदार मांशल दीवारों के बीच
झांकती एक नन्हीं सी कली,
अपने नव जीवन के कटु यथार्थ को             समझने हेतु!

अपने अधिकारों को पाने को लालायित निश्चल मनःस्थिति से!                        
करना चाहती है अपने विचारों को प्रेषित
समाज के बीच!

दानवीय कुविचारों को उखाड़ फेंकने को
तत्पर नवस्फूर्ति नव चेतना से भरी
एक जाज्वल्यमान पुंज की भांति!

अपनी जिज्ञासाओं के घरौदे से
बाहर आने को उतावली,
किंतु ! उसकी विह्वलता,निश्छलता व भाव-कोमलता को
दबा दी जाती है,
एक नुकीली धार के बीच!

हल्के धक्के में ही सिमट जाती है
अतीत की यादें!
अन्तिम स्वसों के बीच,
पथरीली आँखों में
सब चूर हो जाता है क्षण भर में!

हाय ! यह विडंबना है
समाज की ?
छटपटाती है वह नन्ही सी कालिका
झिल्लीदार मांशल दीवारों के बीच!

अनायास ही गूँजती है एक लघु आवाज,
विराट चेतना के रूप में
कोशती है; मानवीय, सामाजिक विडंबना को मनुष्य की नृशंसतापूर्वक बर्बरता व कामुकता को यथार्थवाद के धरातल पर !

कुछ भी व्यक्त नही कर पाती अपने विचारों से,
किन्तु विवश कर देती है !
मानव को सोचने हेतु ?
इस विडंबना के जर्जर मकानों के बीच !

२-  'रहस्य'
 
हर वस्तु,स्थान का भी होता है
अपना एक अद्भुत रहस्य
जिसमे छिपी होती हैं
अपार संभावनाएं

उन रहस्यों में जाना
दूसरी दुनिया में जाने के समान है
जैसे मृत्य के बाद
उस लोक में चले जाने का एहसास !

यह एहसास ही मानव का कराता है प्रत्यक्षीकरण
उन अदृश्य,कलात्मक,निगूढ़, अकाल्पनिक दुनिया से !

इन रहस्यों के बीच भी खो जाता है
मानव का जीवन!

जीवन को खोजने की तलाश में
रोटी और धंधों के बीच भी
होती है एक अदृश्य कड़ी!

जिसे हम पाने की लालसा में
बढ़ते रहते हैं, खोजते रहते हैं
किसी खोई वस्तु को पाने की
अतृप्त आकांक्षा में!

फिर भी घिरे रहते हैं
परत दर परत वे रहस्य
जो कभी खत्म ही नही होते,
मानव के बाद भी !

अनवरत जारी रहता है, उनका दस्तूर
यूँ ही जीवन-जगत की जटिलताओं
के मध्य भी!

दूसरी दुनिया में दख़ल डालने
और पुनः उसी में खो जाने की आत्मानुभूति
का एक सार्थक प्रयास दर्शन की भाँति !

३-   " संबंधों की डोर "

फस जाता हूँ मैं अक्सर....।
संबंधों के बीच मे
उसी तरह !
जैसे किसी पक्षी के चोंच से एक दाना
गिर पड़ा हो गहरे दरार में,
अनेक यत्नों के बीच
निकाल पाना हो जाता है मुश्किल !
फस जाता हूँ मैं अक्सर.....।

कभी-कभी उन संबंधों पर
पड़ जाती हैं चोटें गहरी
लुहार के लोहे की भांति !
तिलमिला उठता है अंतर्मन
उन स्वार्थमय संबंधों की
जलील हरकतों से
फस जाता हूँ मैं अक्सर.....।

मनुष्य का गिरना उसके स्वार्थ के पराकाष्ठा
की होती है हद!
किन्तु ; नियति की चोट जब पड़ती है
आदमी के 'नीयत' पर !
वक्त के मार सी
तो उस अभागे मन को होता है पश्चाताप
अपने अकर्मण्य कर्मों पर
फस जाता हूँ मैं अक्सर
उन स्वार्थमय संबंधों के बीच में.....!

४ - 'नियति के डंडे'

उद्योग व शहरीकरण के अंधी दौड़ में शामिल, मानव के इस विकासयात्रा पर प्रश्नचिह्न लगाती
समूची पृथ्वी कोष रही है मानवीय कृत्यों को महाप्रलय के इस युग में

खुद के साथ होते इस बर्बर, असहनीय कृत्य से छुब्ध
प्रकृति भी बहा रही है आंसू
स्वार्थी होते इंसानों की नीयत पर
निहारते अपनी जर्जर काया

जब नियति के डंडे पड़ेंगे
एक दिन मानव के नग्न देह पर
तब छा जायेंगे उसके अस्तित्व पर संकटों के बादल ज्वालामुखी, तूफानों, अतिवृष्टि, अनावृष्टि के रूप में

फिर आत्मग्लानि में पश्चाताप करते
रोयेंगी इंसानों की आत्माएं एक दिन धरती पर
तब दुनिया में सब कुछ होगा
हवा, मिट्टी, पानी, पहाड़, नदियां, झरने, पेड़ व समूची हरी भरी पृथ्वी सिवाय इंसानों के..!

५- 'दोष इतना ही था कि मैं स्त्री थी'

अनंत आकांक्षाओं को लेकर
जनी थी एक नन्हीं सी परी
माँ की कोख़ से मुस्कराती,
उड़ना चाहती थी उन्मुक्त गगन में
सपनों के सुनहरे पर लगा
संघर्षों के पथ पर

किन्तु ! फस गई अनायास ही
धरा पर कुछ दानवों के बीच!
शिकार हुई क्षणभंगुर वासनाओं की
मनुष्य की अतृप्त हैवानियत में
रौंद दी गई बरबस काया
फसलों की भाँति !

निर्मम, नृशंस पूर्वक बर्बर,
कामुकता की खुरों से !
मांगती रही भीख दया की
याचक बन कर,
हजारों चितत्कारों के मध्य
राजधानी के राजपथ पर !

तड़फती रही अर्धनग्न लहू से लथपथ
चोटों से उभरी असहनीय पीड़ाओं
के बीच ही सिमट गई ज़िन्दगी
डबडबायी पथरीली आँखों से
कराहती, कोशती रही,
मानव की कामुकता को
धरती माँ के आँचल में!

अधटुटे फड़फड़ाते पंखों
को निहारते!
निःशब्द करुणा भरे स्वरों में
कह बैठी अंतिम क्षण धरती माँ से,
मत देना अब किसी परी को
इस तरह बहादुर बिटिया होने का गौरव
ऋषि-मुनियों की धरती पर!

अंतिम शब्दों के साथ मुक्त हो काया से
चीखती है एक ही शब्द
बार-बार !
माँ मैं निर्दोष थी
उन वासनाओं से अतृप्त
दानवों के बीच!
बस दोष मेरा इतना ही था,
कि मैं स्त्री थी!

मनकामना शुक्ल 'पथिक'

परिचय ; अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविता, पुस्तक समीक्षा व विभिन्न विषयों पर आलेख प्रकाशित।
आकाशवाणी द्वारा कविताओं व विभिन्न साहित्यिक वार्ताओं का प्रसारण।
एक कविता संग्रह सीघ्र प्रकाश्य।
संप्रति ; काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी से नब्बे के दशक की हिंदी कविताओं पर अनुसंधान।
पता- B 38/113K1B तुलसीपुर, महमूरगंज, वाराणसी। पिन: 221010
Email-mkshukla2586@gmail.com
Mo. 9450579550

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