मनकामना शुक्ल पथिक की तीन कविताएँ

मनकामना शुक्ल 'पथिक' की तीन कविताएँ।

१ - 'भाषा की तहों में'

करता हूँ प्रवेश
मैं भाषा की तहों में
आहिस्ता-आहिस्ता
जैसे करती हैं प्रवेश हवाएं समूचे
वातावरण में और नदियाँ समंदर में
फिर अपने सही अर्थों को पा
खिल उठता है मेरा चेहरा
जैसे एक बच्चा अपनी माँ से मिल कर
मस्त हो खिलखिला उठता है खुशी से

मिलती है अपनी जड़ों को
फौलादी ताक़तें सौ गुनी
उस भाषा के स्पर्श से
और मैं फैल जाता हूँ
उस बटवृक्ष के अनेक झुकी हुई
शाखाओं की भाँति!
जो जड़ व चेतन के रूप में
जुड़ी होती हैं परस्पर
हमारी चेतनाओं से

जिसकी जड़ें धंसी होती हैं
हमारे अंतश्चेतना की
अतल गहराईयों तक
जहाँ से मिलती है हजार गुना ताकतें
जो बनाती है हमें मज़बूत
तमाम मजबूरियों के खिलाफ!
मैं पूरी ताकत से भाषा को
उछाल देता हूँ अपनी मजबूत
जड़ों के बल उर्ध्वगामी धरातल पर

पृथ्वी की मोटी परतों को धकेलते
उग आता हूँ प्रस्थरों पर भी
कुटज की भाँति
अपनी बाहों को फैलाए
और व्यक्त करता हूँ
युग-युग की संभावनाओं को
अपनी भाषा व भावों के बल पर
मुस्कुराते, निहारते
क्षितिज के उस पार तक

और जीता हूँ अपनी ज़िंदगी के
बचे हिस्सों को
एक फौलादी ताक़तों की तरह
अपने ही भाषा के भीतर गतिशील हो
जिसका फ़ैलाव एक दूसरी भाषा में भी घुलमिल जाता है हवाओं के सदृश...!

२- 'दासता'

जीवन व कर्म के बीच मानव मन मे
पनप उठती है दासता आहिस्ता- आहिस्ता
निकाल फेंकता हूँ उसे अपनी दुनिया से दूर फिर भी उग आती है बिना बीजारोपण के ही बार-बार !

जैसे उगती हैं घासें
फसलों के बीच तेजी से
और छा जाती हैं उनके अस्तित्व पर संकट के बादलों की भांति
ठीक उसी तरह सदियों से पनपती चली आ रही है भेड़ों व भीड़ों में
गुलामी के सदृश दासता

बेचारी फंस जाती हैं भेड़ें
उन चतुर गड़रिये की लाठियों व उनके खूंखार कुत्तों के बीच !
और मूर्ख भीड़ है विवश चतुर राजा के इशारों पर चलने को

कोरोना से भी ख़तरनाक है
ए दासता का वायरस !
जो फैलता है तेजी से हमारे खून में
जहर की भाँति !
हम उसे महसूस नही पाते
स्वीकारना भी नही चाहते
अनचाहे मन से

रहना चाहते हैं
कोषों दूर उसके स्पर्श से
अपने अस्तित्व को
बचाये रखने की जुगत में
फिर भी मज़बूर हैं दासत्व की बेड़ियों में जकड़े अपने इस मुल्क में !

और अभिशप्त हैं उन्हीं के इशारों पर चलने, दौड़ने व खुद को पकड़ने की जुगत में भागते हुए...!

३- 'उम्मीद'

मैं दुःखों को झेल लेता हूँ
इन उम्मीदों के साथ
कि किसी के सुख का भी हिस्सा बन सकूँगा एक दिन

और सुखों में भी जी लेता हूँ दुःख के कुछ पल स्मृत्तियों के सहारे
ताकि अथाह दुःख की घड़ी में भी
बचा सकूँ खुद को टूटने से

सुख दुःख के इस जीवन क्रम में
एक उम्मीद ही है
जिसके सहारे जी रहा हूँ
समर शेष इस नश्वर संसार में !

मनकामना शुक्ल 'पथिक'

परिचय ; अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविता, पुस्तक समीक्षा व विभिन्न विषयों पर आलेख प्रकाशित।
आकाशवाणी द्वारा कविताओं व विभिन्न साहित्यिक वार्ताओं का प्रसारण।
एक कविता संग्रह सीघ्र प्रकाश्य।
संप्रति ; काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी से नब्बे के दशक की हिंदी कविताओं पर अनुसंधान।
पता- B 38/113K1B तुलसीपुर, महमूरगंज, वाराणसी। पिन: 221010
Email-mkshukla2586@gmail.com
Mo. 9450579550

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